भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

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  • रामचरितमानस *

हे नाथ! आप मनमें समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्रका वियोग अपार समुद्र है। अयोध्या जहाज है और आप उसके कर्णधार (खेनेवाले) हैं। सब प्रियजन (कुटुम्बी और प्रजा) ही यात्रियोंका समाज है जो इस जहाजपर चढ़ा हुआ है ॥ ३ ॥

धीरजु धरिअ त पाइअ पारू । नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू ॥ जौं जियै धरिअ बिनय पिय मोरी । रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी ॥

आप धीरज धरियेगा तो सब पार पहुँच जायँगे। नहीं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदयमें धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे ॥ ४ ॥

दो०—प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उधारि ।

तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि ॥ १५४ ॥

प्रिय पत्नी कौसल्याके कोमल वचन सुनते हुए राजाने आँखें खोलकर देखा! मानो तड़पती हुई दीन मछलीपर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो ॥ १५४ ॥

धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू । कहु सुमंत्र कहैं राम कृपालू ॥ कहाँ लखनु कहैं रामु सनेही । कहैं प्रिय पुत्रबधू बैदेही ॥

धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले—सुमन्त्र! कहो, कृपालु श्रीराम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्नेही राम कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है? ॥ १ ॥

बिलपत राउ बिकल बहु भाँती । भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥ तापस अंध साप सुधि आई । कौसल्याहि सब कथा सुनाई ॥

राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकारसे विलाप कर रहे हैं। वह रात युगके समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजाको अंधे तपस्वी (श्रवणकुमारके पिता) के शापकी याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्याको कह सुनायी ॥ २ ॥

भयउ बिकल बरनत इतिहासा । राम रहित धिग जीवन आसा ॥ सो तनु राखि करब मैं काहा । जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा ॥

उस इतिहासका वर्णन करते-करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीरामके बिना जीनेकी आशाको धिक्कार है। मैं उस शरीरको रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेमका प्रण नहीं निबाहा? ॥ ३ ॥

हा रघुनंदन प्रान पिरिते । तुम्ह बिनु जितत बहुत दिन बीते ॥ हा जानकी लखन हा रघुबर । हा पितु हित चित चातक जलधर ॥

हा रघुकुलको आनन्द देनेवाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर! हा पिताके चित्तरूपी चातकके हित करनेवाले मेघ! ॥ ४ ॥