भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 473
  • अयोध्याकाण्ड *

४७१

मैं आपन किमि कहौं कलेसू । जित फिरेउँ लेइ राम सँदेसू ॥ अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ । हानि गलानि सोच बस भयऊ ॥

मैं अपने क्लेशको कैसे कहूँ, जो श्रीरामजीका यह सँदेसा लेकर जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मन्त्रीकी वाणी रुक गयी (वे चुप हो गये) और वे हानिकी ग्लानि और सोचके वश हो गये ॥ २ ॥

सूत बचन सुनतहिं नरनाहू । परेउ धरनि उर दारुन दाहू ॥ तलफत बिषम मोह मन मापा । माजा मनहुँ मीन कहुँ व्यापा ॥

सारथी सुमन्त्रके वचन सुनते ही राजा पृथ्वीपर गिर पड़े, उनके हृदयमें भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोहसे व्याकुल हो गया। मानो मछलीको माँजा व्याप गया हो (पहली वर्षाका जल लग गया हो) ॥ ३ ॥

करि बिलाप सब रोवहिं रानी । महा बिपति किमि जाइ बखानी ॥ सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा । धीरजहू कर धीरजु भागा ॥

सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं। उस महान् विपत्तिका कैसे वर्णन किया जाय? उस समयके विलापको सुनकर दुःखको भी दुःख लगा और धीरजका भी धीरज भाग गया! ॥ ४ ॥

दो०— भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु ।

बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहु कुलिस कठोरु ॥ १५३ ॥

राजाके रावले (रनिवास) में [रोनेका] शोर सुनकर अयोध्याभरमें बड़ा भारी कुहराम मच गया! [ऐसा जान पड़ता था] मानो पक्षियोंके विशाल वनमें रातके समय कठोर वज्र गिरा हो ॥ १५३ ॥

प्राण कंठगत भयउ भुआलू । मनि बिहीन जनु व्याकुल व्यालू ॥ इंद्री सकल बिकल भई भारी । जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी ॥

राजाके प्राण कण्ठमें आ गये। मानो मणिके बिना साँप व्याकुल (मरणासन्न) हो गया हो। इन्द्रियाँ सब बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जलके तालाबमें कमलोंका वन मुरझा गया हो ॥ १ ॥

कौसल्याँ नृपु दीख मलाना । रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना ॥ उर धरि धीर राम महतारी । बोली बचन समय अनुसारी ॥

कौसल्याजीने राजाको बहुत दुखी देखकर अपने हृदयमें जान लिया कि अब सूर्यकुलका सूर्य अस्त हो चला! तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्या हृदयमें धीरज धरकर समयके अनुकूल वचन बोलीं— ॥ २ ॥

नाथ समुद्धि मन करिअ बिचारु । राम बियोग पयोधि अपारु ॥ करनधार तुम्ह अवध जहाजू । चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू ॥