श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 513, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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प्रतिकूल विधाताकी करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयीको बावली बना दिया (उसकी मति फेर दी)। उस रातको प्रभु श्रीरामचन्द्रजी बार-बार आदरपूर्वक आपकी बड़ी सराहना करते थे। तुलसीदासजी कहते हैं—[निषादराज कहता है कि—]श्रीरामचन्द्रजीको आपके समान अतिशय प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। परिणाममें मङ्गल होगा, यह जानकर आप अपने हृदयमें धैर्य धारण कीजिये।
सो०—अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।
चलिअ करिअ विश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन ॥ २०१ ॥
श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपाके धाम हैं, यह विचारकर और मनमें दृढ़ता लाकर चलिये और विश्राम कीजिये ॥ २०१ ॥
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा । बास चले सुमिरत रघुबीरा ॥ यह सुधि पाइ नगर नर नारी । चले बिलोकन आरत भारी ॥
सखाके वचन सुनकर, हृदयमें धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए भरतजी डेरेको चले। नगरके सारे स्त्री-पुरुष यह (श्रीरामजीके ठहरनेके स्थानका) समाचार पाकर बड़े आतुर होकर उस स्थानको देखने चले ॥ १ ॥
परदखिना करि करहिं प्रनामा । देहिं कैकइहि खोरि निकामा ॥ भरि भरि बारि बिलोचन लेहीं । बाम बिधातहि दूषन देहीं ॥
वे उस स्थानकी परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयीको बहुत दोष देते हैं। नेत्रोंमें जल भर-भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाताको दूषण देते हैं ॥ २ ॥
एक सराहहिं भरत सनेहू । कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू ॥ निंदहिं आपु सराहि निषादहि । को कहि सकइ बिमोह विषादहि ॥
कोई भरतजीके स्नेहकी सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजाने अपना प्रेम खूब निबाहा। सब अपनी निन्दा करके निषादकी प्रशंसा करते हैं। उस समयके विमोह और विषादको कौन कह सकता है? ॥ ३ ॥
एहि बिधि राति लोगु सबु जागा । भा भिनुसार गुदारा लागा ॥ गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाई । नई नाव सब मातु चढ़ाई ॥
इस प्रकार रातभर सब लोग जागते रहे। सबेरा होते ही खेवा लगा। सुन्दर नावपर गुरुजीको चढ़ाकर फिर नयी नावपर सब माताओंको चढ़ाया ॥ ४ ॥
दंड चारि महँ भा सबु पारा । उतरि भरत तब सबहि सँभारा ॥