श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
चार घड़ीमें सब गङ्गाजीके पार उतर गये। तब भरतजीने उतरकर सबको सँभाला ॥ ५ ॥
दो०— प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ ॥ २०२ ॥
प्रातःकालकी क्रियाओंको करके माताके चरणोंकी वन्दना कर और गुरुजीको सिर नवाकर भरतजीने निषादगणोंको [रास्ता दिखलानेके लिये] आगे कर लिया और सेना चला दी ॥ २०२ ॥
कियउ निषादनाथु अगुआई। मातु पालकीं सकल चलाई ॥
साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा ॥
निषादराजको आगे करके पीछे सब माताओंकी पालकियाँ चलायीं। छोटे भाई शत्रुघ्णजीको बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्राह्मणोंसहित गुरुजीने गमन किया ॥ १ ॥
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू ॥
गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए ॥
तदनन्तर आप (भरतजी) ने गङ्गाजीको प्रणाम किया और लक्ष्मणसहित श्रीसीतारामजीका स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल (बिना सवारके) घोड़े बागडोरसे बँधे हुए चले जा रहे हैं ॥ २ ॥
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा ॥
रामु पयादेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ॥
उत्तम सेवक बार-बार कहते हैं कि हे नाथ! आप घोड़ेपर सवार हो लीजिये। [भरतजी जवाब देते हैं कि] श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं ॥ ३ ॥
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा ॥
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी ॥
मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिरके बल चलकर जाऊँ। सेवकका धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजीकी दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानिके मारे गले जा रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०— भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ॥ २०३ ॥
प्रेममें उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजीने तीसरे पहर प्रयागमें प्रवेश किया ॥ २०३ ॥
झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें ॥
भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ॥