भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 515
  • अयोध्याकाण्ड *

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उनके चरणोंमें छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमलकी कलीपर ओसकी बूँदे चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आये हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया ॥ १ ॥

खबरि लीन्ह सब लोग नहाए । कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ॥ सबिधि सित्तासित नीर नहाने । दिए दान महिसुर सनमाने ॥

जब भरतजीने यह पता पा लिया कि सब लोग स्नान कर चुके, तब त्रिवेणीपर आकर उन्हें प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक [गङ्गा-यमुनाके] श्वेत और श्याम जलमें स्नान किया और दान देकर ब्राह्मणोंका सम्मान किया ॥ २ ॥

देखत स्यामल धवल हलोरै । पुलकि सरीर भरत कर जोरै ॥ सकल कामप्रद तीरथराऊ । बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ॥

श्याम और सफेद (यमुनाजी और गङ्गाजीकी) लहरोंको देखकर भरतजीका शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आपका प्रभाव वेदोंमें प्रसिद्ध और संसारमें प्रकट है ॥ ३ ॥

मागउँ भीख त्यागि निज धरमू । आरत काह न करइ कुकरमू ॥ अस जियँ जानि सुजान सुदानी । सफल करहिं जग जाचक बानी ॥

मैं अपना धर्म (न माँगनेका क्षत्रियधर्म) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता? ऐसा हृदयमें जानकर सुजान उत्तम दानी जगत्में माँगनेवालेकी वाणीको सफल किया करते हैं (अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं) ॥ ४ ॥

दो०—अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान ।

जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥ २०४ ॥

मुझे न अर्थकी रुचि (इच्छा) है, न धर्मकी, न कामकी और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्ममें मेरा श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं ॥ २०४ ॥

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही । लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥ सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढउ अनुग्रह तोरें ॥

स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामिद्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-दिन बढ़ता ही रहे ॥ १ ॥

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ । जाचत जलु पबि पाहन डारउ ॥ चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढें प्रेम सब भाँति भलाई ॥