भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 522

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  • रामचरितमानस *

मेरे लिये उसने यह सारा कुठाट (बुरा साज) रचा और सारे जगत्को बारहबाट (छिन्न-भिन्न) करके नष्ट कर डाला। यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं ॥ ३ ॥

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई । सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई ॥ तात करहु जनि सोचु बिसेषी । सब दुखु मिटिहि राम पग देखी ॥

भरतजीके वचन सुनकर मुनिने सुख पाया और सभीने उनकी बहुत प्रकारसे बड़ाई की। [मुनिने कहा—] हे तात! अधिक सोच मत करो। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा ॥ ४ ॥

दो०— करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु ।

कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ॥ २१२ ॥

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीने उनका समाधान करके कहा—अब आपलोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द-मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये ॥ २१२ ॥

सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू । भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ॥ जानि गुरुइ गुर गिरा बहोरी । चरन बंदि बोले कर जोरी ॥

मुनिके वचन सुनकर भरतके हृदयमें सोच हुआ कि यह बेमौके बड़ा बेदब संकोच आ पड़ा! फिर गुरुजनोंकी वाणीको महत्त्वपूर्ण (आदरणीय) समझकर, चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ १ ॥

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरम यहु नाथ हमारा ॥ भरत बचन मुनिबर मन भाए । सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ॥

हे नाथ! आपकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसका पालन करना, यह हमारा परम धर्म है। भरतजीके ये वचन मुनिश्रेष्ठके मनको अच्छे लगे। उन्होंने विश्वासपात्र सेवकों और शिष्योंको पास बुलाया ॥ २ ॥

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई । कंद मूल फल आनहु जाई ॥ भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए । प्रमुदित निज निज काज सिधाए ॥

[और कहा कि] भरतकी पहुनाई करनी चाहिये। जाकर कन्द, मूल और फल लाओ। उन्होंने 'हे नाथ! बहुत अच्छा' कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने-अपने कामको चल दिये ॥ ३ ॥

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता । तसि पूजा चाहिअ जस देवता ॥ सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई । आयसु होइ सो करहिं गोसाई ॥

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