श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
५११
नाहिन डरु बिगिरिहि परलोकू । पितहु मरन कर मोहि न सोकू ॥ सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए । लछिमन राम सरिस सुत पाए ॥
न यही डर है कि मेरा परलोक बिगड़ जायगा और न पिताजीके मरनेका ही मुझे शोक है। क्योंकि उनका सुन्दर पुण्य और सुयश विश्वभरमें सुशोभित है। उन्होंने श्रीराम-लक्ष्मण-सरीखे पुत्र पाये ॥ ३ ॥
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू । भूप सोच कर कवन प्रसंगू ॥ राम लखन सिय बिनु पग पनहीं । करि मुनि बेष फिरिहँ बन बनहीं ॥
फिर जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें अपने क्षणभङ्गुर शरीरको त्याग दिया, ऐसे राजाके लिये सोच करनेका कौन प्रसंग है? [सोच इसी बातका है कि] श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी पैरोंमें बिना जूतीके मुनियोंका वेष बनाये वन-वनमें फिरते हैं ॥ ४ ॥
दो०— अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात ।
बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात ॥ २११ ॥
वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फलोंका भोजन करते हैं, पृथ्वीपर कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं और वृक्षोंके नीचे निवास करके नित्य सदी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं ॥ २११ ॥
एहि दुख दाहँ दहड़ दिन छाती । भूख न बासर नीद न राती ॥ एहि कुरोग कर औषधु नाहीं । सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ॥
इसी दुःखकी जलनसे निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है। मुझे न दिनमें भूख लगती है, न रातको नीद आती है। मैंने मन-ही-मन समस्त विश्वको खोज डाला, पर इस कुरोगकी औषध कहीं नहीं है ॥ १ ॥
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला । तेहिँ हमार हित कीन्ह बँसूला ॥ कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्र । गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्र ॥
माताका कुमत (बुरा विचार) पापोंका मूल बढ़ई है। उसने हमारे हितका बसूला बनाया। उससे कलहरूपी कुकाठका कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्षकी अवधिरूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्रको गाड़ दिया। [यहाँ माताका कुविचार बढ़ई है, भरतको राज्य बसूला है, रामका वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्षकी अवधि कुमन्त्र है] ॥ २ ॥
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिँ ठाटा । घालेसि सब जगु बारहबाटा ॥ मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ । बसइ अवध नहिँ आन उपाएँ ॥