श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 520, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें५१८
- रामचरितमानस *
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं॥ सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा॥
हे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते। हम उदासीन हैं (किसीका पक्ष नहीं करते), तपस्वी हैं (किसीकी मुँहदेखी नहीं कहते) और बनमें रहते हैं (किसीसे कुछ प्रयोजन नहीं रखते)। सब साधनोंका उत्तम फल हमें लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका दर्शन प्राप्त हुआ॥ २॥
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा॥ भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ॥
[सीता-लक्ष्मणसहित श्रीरामदर्शनरूप] उस महान् फलका परम फल यह तुम्हारा दर्शन है। प्रयागराजसमेत हमारा बड़ा भाग्य है। हे भरत! तुम धन्य हो, तुमने अपने यशसे जगत्को जीत लिया है। ऐसा कहकर मुनि प्रेममें मग्न हो गये॥ ३॥
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे॥ धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा॥
भरद्वाज मुनिके वचन सुनकर सभासद हर्षित हो गये। 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये। आकाशमें और प्रयागराजमें 'धन्य, धन्य' की ध्वनि सुन-सुनकर भरतजी प्रेममें मग्न हो रहे हैं॥ ४॥
दो०—पुलक गात हिर्यँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन॥ २१०॥
भरतजीका शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीतारामजी हैं और कमलके समान नेत्र [प्रेमाश्रुके] जलसे भरे हैं। वे मुनियोंकी मण्डलीको प्रणाम करके गद्गद वचन बोले—॥ २१०॥
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥ एहि थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई॥
मुनियोंका समाज है और फिर तीर्थराज है। यहाँ सच्ची सौगंध खानेसे भी भरपूर हानि होती है। इस स्थानमें यदि कुछ बनाकर कहा जाय, तो इसके समान कोई बड़ा पाप और नीचता न होगी॥ १॥
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ॥ मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू॥
मैं सच्चे भावसे कहता हूँ। आप सर्वज्ञ हैं, और श्रीरघुनाथजी हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं (मैं कुछ भी असत्य कहूँगा तो आपसे और उनसे छिपा नहीं रह सकता)। मुझे माता कैकेयीकी करनीका कुछ भी सोच नहीं है। और न मेरे मनमें इसी बातका दुःख है कि जगत् मुझे नीच समझेगा॥ २॥