श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 519, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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हे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजीके दास कुमुद और चकोर हैं [वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोरको दुःख होता है]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगद्दूषी आकाशमें यह घटेगा नहीं, वरं दिन-दिन दूना होगा॥ १ ॥
कोक तिलोक प्रीति अति करिही । प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही ॥ निसि दिन सुखद सदा सब काहू । ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू ॥
त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमापर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका प्रतापरूपी सूर्य इसकी छविको हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात-दिन सदा सब किसीको सुख देनेवाला होगा। कैकेयीका कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा॥ २ ॥
पूरन राम सुपेम पियूषा । गुर अवमान दोष नहीं दूषा ॥ रामभगत अब अमिअँ अघाहूँ । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ॥
यह चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतसे पूर्ण है। यह गुरुके अपमानरूपी दोषसे दूषित नहीं है। तुमने इस यशरूपी चन्द्रमाकी सृष्टि करके पृथ्वीपर भी अमृतको सुलभ कर दिया। अब श्रीरामजीके भक्त इस अमृतसे तृप्त हो लें॥ ३ ॥
भूप भगीरथ सुरसरि आनी । सुमिरत सकल सुमंगल खानी ॥ दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं । अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं ॥
राजा भगीरथ गङ्गाजीको लाये, जिन (गङ्गाजी) का स्मरण ही सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंकी खान है। दशरथजीके गुणसमूहोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता; अधिक क्या, जिनकी बराबरीका जगत्में कोई नहीं है॥ ४ ॥
दो०—जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ। जे हर हिय नयननि कबहूँ निरखे नहीं अघाइ ॥ २०९ ॥
जिनके प्रेम और संकोच (शील) के वशमें होकर स्वयं [सच्चिदानन्दधन] भगवान् श्रीराम आकर प्रकट हुए, जिन्हें श्रीमहादेवजी अपने हृदयके नेत्रोंसे कभी अघाकर नहीं देख पाये (अर्थात् जिनका स्वरूप हृदयमें देखते-देखते शिवजी कभी तुम नहीं हुए)॥ २०९ ॥
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा । जहाँ बस राम पेम मृगरूपा ॥ तात गलानि करहु जियँ जाएँ । डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ ॥
[परन्तु उनसे भी बढकर] तुमने कीर्तिरूपी अनुपम चन्द्रमाको उत्पन्न किया, जिसमें श्रीरामप्रेम ही हिरनके [चिह्नेके] रूपमें बसता है। हे तात! तुम व्यर्थ ही हृदयमें ग्लानि कर रहे हो। पारस पाकर भी तुम दरिद्रतासे डर रहे हो!॥ १ ॥