श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिये उचित था। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम होना ही संसारमें समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल है॥ २०७॥
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना॥ यह तुम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता॥
सो वह (श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिये यह आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथजीके पुत्र और श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे भाई हो॥ १॥
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं॥ लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती॥
हे भरत! सुनो, श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तीनोंको सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेमके साथ तुम्हारी सराहना करते ही बीती॥ २॥
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरे अनुरागा॥ तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर केँ। सुख जीवन जग जस जड़ नर केँ॥
प्रयागराजमें जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेममें मग्न हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा ही (अगाध) स्नेह है जैसा मूर्ख (विषयासक्त) मनुष्यका संसारमें सुखमय जीवनपर होता है॥ ३॥
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई॥ तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरेँ देह जनु राम सनेहू॥
यह श्रीरघुनाथजीकी बहुत बड़ाई नहीं है। क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागतके कुटुम्बभरको पालनेवाले हैं। हे भरत! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजीके प्रेम ही हो॥ ४॥
दो०— तुम्ह कहैं भरत कलंक यह हम सब कहैं उपदेशु।
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु॥ २०८॥
हे भरत! तुम्हारे लिये (तुम्हारी समझमें) यह कलङ्क है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है। श्रीरामभक्तिरूपी रसकी सिद्धिके लिये यह समय गणेश (बड़ा शुभ) हुआ है॥ २०८॥
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा॥ उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥