श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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तब यह जानकर समाधान हो गया कि भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहनेमें (आज्ञाकारी) हैं। लक्ष्मणजीने देखा कि प्रभु श्रीरामजीके हृदयमें चिन्ता है तो वे समयके अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे— ॥ ३ ॥
बिनु पूछें कछु कहउँ गोसाईं । सेवकु समयै न ढीठ ढिठाईं ॥ तुम्ह सर्बंगय सिरोमनि स्वामी । आपनि समुझि कहउँ अनुगामी ॥
हे स्वामी ! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूँ; सेवक समयपर ढिठाई करनेसे ढीठ नहीं समझा जाता (अर्थात् आप पूछें तब मैं कहूँ, ऐसा अवसर नहीं है; इसीलिये यह मेरा कहना ढिठाई नहीं होगा)। हे स्वामी ! आप सर्वज्ञोंमें शिरोमणि हैं (सब जानते ही हैं)। मैं सेवक तो अपनी समझकी बात कहता हूँ ॥ ४ ॥
दो०—नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान । सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान ॥ २२७ ॥
हे नाथ ! आप परम सुहृद (बिना ही कारण परम हित करनेवाले), सरलहृदय तथा शील और स्नेहके भण्डार हैं, आपका सभीपर प्रेम और विश्वास है और अपने हृदयमें सबको अपने ही समान जानते हैं ॥ २२७ ॥
बिषई जीव पाड़ प्रभुताईं । मूढ़ मोह बस होहिं जनाईं ॥ भरतु नीति रत साधु सुजाना । प्रभु पद प्रेमु सकल जगु जाना ॥
परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूपको प्रकट कर देते हैं। भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु (आप) के चरणोंमें उनका प्रेम है, इस बातको सारा जगत् जानता है ॥ १ ॥
तेऊ आजु राम पदु पाईं । चले धरम मरजाद मेटाईं ॥ कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी । जानि राम बनबास एकाकी ॥
वे भरत भी आज श्रीरामजी (आप) का पद (सिंहासन या अधिकार) पाकर धर्मकी मर्यादाको मिटाकर चले हैं। कुटिल छोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी (आप) वनवासमें अकेले (असहाय) हैं, ॥ २ ॥
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू । आए करै अकंटक राजू ॥ कोटि प्रकार कलपि कुटिलाईं । आए दल बटोरि दोउ भाई ॥
अपने मनमें बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्यको निष्कण्टक करनेके लिये यहाँ आये हैं। करोड़ों (अनेकों) प्रकारकी कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं ॥ ३ ॥