भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 536

५३४

  • रामचरितमानस *

जों जियँ होति न कपट कुचाली । केहि सोहाति रथ बाजि गजाली ॥ भरतहि दोसु देइ को जाएँ । जग बौराइ राज पदु पाएँ ॥

यदि इनके हृदयमें कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़े और हाथियोंकी कतार [ऐसे समय] किये सुहाती? परन्तु भरतको ही व्यर्थ कौन दोष दे? राजपद पा जानेपर सारा जगत् ही पागल (मतवाला) हो जाता है ॥ ४ ॥

दो०—ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान ।

लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान ॥ २२८ ॥

चन्द्रमा गुरुपलीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणोंकी पालकीपर चढ़ा। और राजा वेनके समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनोंसे विमुख हो गया ॥ २२८ ॥

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू । केहि न राजमद दीन्ह कलंकू ॥ भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ । रिपु रिन रंच न राखब काऊ ॥

सहसबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमदने कलङ्क नहीं दिया? भरतने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋणको कभी जरा भी शेष नहीं रखना चाहिये ॥ १ ॥

एक कीन्हि नहिं भरत भलाई । निदरे रामु जानि असहाई ॥ समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी । समर सरोष राम मुखु पेखी ॥

हाँ, भरतने एक बात अच्छी नहीं की, जो रामजी (आप) को असहाय जानकर उनका निरादर किया! पर आज संग्राममें श्रीरामजी (आप) का क्रोधपूर्ण मुख देखकर यह बात भी उनकी समझमें विशेषरूपसे आ जायगी (अर्थात् इस निरादरका फल भी वे अच्छी तरह पा जायेंगे) ॥ २ ॥

एतना कहत नीति रस भूला । रन रस बिटपु पुलक मिस फूला ॥ प्रभु पद बंदि सीस रज राखी । बोले सत्य सहज बलु भाषी ॥

इतना कहते ही लक्ष्मणजी नीतिरस भूल गये और युद्धरसरूपी वृक्ष पुलकावलीके बहानेसे फूल उठा (अर्थात् नीतिकी बात कहते-कहते उनके शरीरमें वीर-रस छा गया)। वे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी वन्दना करके, चरण-रजको सिरपर रखकर सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए बोले ॥ ३ ॥

अनुचित नाथ न मानब मोरा । भरत हमहि उपचार न थोरा ॥ कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें । नाथ साथ धनु हाथ हमारें ॥

हे नाथ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरतने हमें कम नहीं प्रचारा है (हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है)। आखिर कहाँतक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथमें है! ॥ ४ ॥