भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 540

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  • रामचरितमानस *

फिर सबको नदीके समीप ठहराकर तथा माता, गुरु और मन्त्रीकी आज्ञा माँगकर निषादराज और शत्रुघ्नको साथ लेकर भरतजी वहाँको चले जहाँ श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी थे ॥ ३ ॥

समुद्धि मातु करतब सकुचाहीं । करत कुतरक कोटि मन माहीं ॥ रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ॥

भरतजी अपनी माता कैकेयीकी करनीको समझकर (याद करके) सकुचाते हैं और मनमें करोड़ों (अनेकों) कुतर्क करते हैं [सोचते हैं—] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जायँ ॥ ४ ॥

दो०—मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो शोर ।

अद्य अवगुन छमि आदरहिं समुद्धि आपनी ओर ॥ २३३ ॥

मुझे माताके मतमें मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर (अपने विरद और सम्बन्धको देखकर) मेरे पापों और अवगुणोंको क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे ॥ २३३ ॥

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी । जौं सनमानहिं सेवकु मानी ॥ मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥

चाहे मलिन-मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें (कुछ भी करें); मेरे तो श्रीरामचन्द्रजीकी जूतियाँ ही शरण हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दासका ही है ॥ १ ॥

जग जस भाजन चातक मीना । नेम पेम निज निपुन नबीना ॥ अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ॥

जगत्में यशके पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेमको सदा नया बनाये रखनेमें निपुण हैं। ऐसा मनमें सोचते हुए भरतजी मार्गमें चले जाते हैं। उनके सब अङ्ग संकोच और प्रेमसे शिथिल हो रहे हैं ॥ २ ॥

फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी । चलत भगति बल धीरज धोरी ॥ जब समुद्धत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ॥

माताकी की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी भक्तिके बलसे चले जाते हैं। जब श्रीरघुनाथजीके स्वभावको समझते (स्मरण करते) हैं तब मार्गमें उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं ॥ ३ ॥

भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी ॥ देखि भरत कर सोचु सनेहू । भा निषाद तेहि समर्य बिदेहू ॥