भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 539
  • अयोध्याकाण्ड *

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मच्छरकी फूँकसे चाहे सुमेरु उड़ जाय। परन्तु हे भाई ! भरतको राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजीकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरतके समान पवित्र और उत्तम भाई संसारमें नहीं है ॥ २ ॥

सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता । मिलइ रचइ परपंचु बिधाता ॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा । जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ॥

हे तात! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जलको मिलाकर विधाता इस दृश्य-प्रपञ्च (जगत्) को रचता है। परन्तु भरतने सूर्यवंशरूपी तालाबमें हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोषका विभाग कर दिया (दोनोंको अलग-अलग कर दिया) ॥ ३ ॥

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी । निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ॥ कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ । पेम पयोधि मगन रघुराऊ ॥

गुणरूपी दूधको ग्रहणकर और अवगुणरूपी जलको त्यागकर भरतने अपने यशसे जगत्में उजियाला कर दिया है। भरतजीके गुण, शील और स्वभावको कहते-कहते श्रीरघुनाथजी प्रेमसमुद्रमें मग्न हो गये ॥ ४ ॥

दो०— सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु। सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु ॥ २३२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी वाणी सुनकर और भरतजीपर उनका प्रेम देखकर समस्त देवता उनकी सराहना करने लगे [और कहने लगे] कि श्रीरामचन्द्रजीके समान कृपाके धाम प्रभु और कौन हैं? ॥ २३२ ॥

जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम धुर धरनि धरत को ॥ कबि कुल अगम भरत गुन गाथा । को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥

यदि जगत्में भरतका जन्म न होता, तो पृथ्वीपर सम्पूर्ण धर्मोंकी धुरीको कौन धारण करता? हे रघुनाथजी! कविकुलके लिये अगम (उनकी कल्पनासे अतीत) भरतजीके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है? ॥ १ ॥

लखन राम सियँ सुनि सुर बानी । अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी ॥ इहाँ भरतु सब सहित सहाए । मंदाकिनीं पुनीत नहाए ॥

लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने देवताओंकी वाणी सुनकर अत्यन्त सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ भरतजीने सारे समाजके साथ पवित्र मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥ २ ॥

सरित समीप राखि सब लोगा । मागि मातु गुर सचिव नियोगा ॥ चले भरतु जहाँ सिय रघुराई । साथ निषादनाथु लघु भाई ॥