श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 538, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
सारा जगत् भयमें डूब गया। तब लक्ष्मणजीके अपार बाहुबलकी प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई—हे तात ! तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन कह सकता है और कौन जान सकता है ? ॥ १ ॥
अनुचित उचित काजु किछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ॥ सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥
परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं ॥ २ ॥
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने । राम सीयँ सादर सनमाने ॥ कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब तें कठिन राजमदु भाई ॥
देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने उनका आदरके साथ सम्मान किया [और कहा—] हे तात ! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई ! राज्यका मद सबसे कठिन मद है ॥ ३ ॥
जो अचर्वंत नृप मातहिं तेई । नाहिन साधुसभा जेहिं सेई ॥ सुनहु लखन भल भरत सरीसा । बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा ॥
जिन्होंने साधुओंकी सभाका सेवन (सत्सङ्ग) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिराका आचमन करते ही (पीते ही) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्ष्मण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्माकी सृष्टिमें न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है ॥ ४ ॥
दो०— भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥ २३१ ॥
[अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है] ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका पद पाकर भी भरतको राज्यका मद नहीं होनेका ! क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता (फट सकता) है ? ॥ २३१ ॥
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई । गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ॥
अन्धकार चाहे तरुण (मध्याह्नके) सूर्यको निगल जाय। आकाश चाहे बादलोंमें समाकर मिल जाय। गौके खुर-इतने जलमें अगस्त्यजी डूब जायँ और पृथ्वी चाहे अपनी स्वाभाविक क्षमा (सहनशीलता) को छोड़ दे ॥ १ ॥
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृपमदु भरतहि भाई ॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ॥