श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५३६
- रामचरितमानस *
सारा जगत् भयमें डूब गया। तब लक्ष्मणजीके अपार बाहुबलकी प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई—हे तात ! तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन कह सकता है और कौन जान सकता है ? ॥ १ ॥
अनुचित उचित काजु किछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ॥ सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥
परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ-बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं ॥ २ ॥
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने । राम सीयँ सादर सनमाने ॥ कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब तें कठिन राजमदु भाई ॥
देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने उनका आदरके साथ सम्मान किया [और कहा—] हे तात ! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई ! राज्यका मद सबसे कठिन मद है ॥ ३ ॥
जो अचर्वंत नृप मातहिं तेई । नाहिन साधुसभा जेहिं सेई ॥ सुनहु लखन भल भरत सरीसा । बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा ॥
जिन्होंने साधुओंकी सभाका सेवन (सत्सङ्ग) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिराका आचमन करते ही (पीते ही) मतवाले हो जाते हैं। हे लक्ष्मण ! सुनो, भरत-सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्माकी सृष्टिमें न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है ॥ ४ ॥
दो०— भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥ २३१ ॥
[अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है] ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका पद पाकर भी भरतको राज्यका मद नहीं होनेका ! क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता (फट सकता) है ? ॥ २३१ ॥
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई । गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ॥ गोपद जल बूड़हिं घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ॥
अन्धकार चाहे तरुण (मध्याह्नके) सूर्यको निगल जाय। आकाश चाहे बादलोंमें समाकर मिल जाय। गौके खुर-इतने जलमें अगस्त्यजी डूब जायँ और पृथ्वी चाहे अपनी स्वाभाविक क्षमा (सहनशीलता) को छोड़ दे ॥ १ ॥
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृपमदु भरतहि भाई ॥ लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५३७
मच्छरकी फूँकसे चाहे सुमेरु उड़ जाय। परन्तु हे भाई ! भरतको राजमद कभी नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजीकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरतके समान पवित्र और उत्तम भाई संसारमें नहीं है ॥ २ ॥
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता । मिलइ रचइ परपंचु बिधाता ॥ भरतु हंस रबिबंस तड़ागा । जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ॥
हे तात! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जलको मिलाकर विधाता इस दृश्य-प्रपञ्च (जगत्) को रचता है। परन्तु भरतने सूर्यवंशरूपी तालाबमें हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोषका विभाग कर दिया (दोनोंको अलग-अलग कर दिया) ॥ ३ ॥
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी । निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ॥ कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ । पेम पयोधि मगन रघुराऊ ॥
गुणरूपी दूधको ग्रहणकर और अवगुणरूपी जलको त्यागकर भरतने अपने यशसे जगत्में उजियाला कर दिया है। भरतजीके गुण, शील और स्वभावको कहते-कहते श्रीरघुनाथजी प्रेमसमुद्रमें मग्न हो गये ॥ ४ ॥
दो०— सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु। सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु ॥ २३२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी वाणी सुनकर और भरतजीपर उनका प्रेम देखकर समस्त देवता उनकी सराहना करने लगे [और कहने लगे] कि श्रीरामचन्द्रजीके समान कृपाके धाम प्रभु और कौन हैं? ॥ २३२ ॥
जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम धुर धरनि धरत को ॥ कबि कुल अगम भरत गुन गाथा । को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥
यदि जगत्में भरतका जन्म न होता, तो पृथ्वीपर सम्पूर्ण धर्मोंकी धुरीको कौन धारण करता? हे रघुनाथजी! कविकुलके लिये अगम (उनकी कल्पनासे अतीत) भरतजीके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है? ॥ १ ॥
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी । अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी ॥ इहाँ भरतु सब सहित सहाए । मंदाकिनीं पुनीत नहाए ॥
लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने देवताओंकी वाणी सुनकर अत्यन्त सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ भरतजीने सारे समाजके साथ पवित्र मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥ २ ॥
सरित समीप राखि सब लोगा । मागि मातु गुर सचिव नियोगा ॥ चले भरतु जहाँ सिय रघुराई । साथ निषादनाथु लघु भाई ॥
५३८
- रामचरितमानस *
फिर सबको नदीके समीप ठहराकर तथा माता, गुरु और मन्त्रीकी आज्ञा माँगकर निषादराज और शत्रुघ्नको साथ लेकर भरतजी वहाँको चले जहाँ श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी थे ॥ ३ ॥
समुद्धि मातु करतब सकुचाहीं । करत कुतरक कोटि मन माहीं ॥ रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ॥
भरतजी अपनी माता कैकेयीकी करनीको समझकर (याद करके) सकुचाते हैं और मनमें करोड़ों (अनेकों) कुतर्क करते हैं [सोचते हैं—] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जायँ ॥ ४ ॥
दो०—मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो शोर ।
अद्य अवगुन छमि आदरहिं समुद्धि आपनी ओर ॥ २३३ ॥
मुझे माताके मतमें मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर (अपने विरद और सम्बन्धको देखकर) मेरे पापों और अवगुणोंको क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे ॥ २३३ ॥
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी । जौं सनमानहिं सेवकु मानी ॥ मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥
चाहे मलिन-मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें (कुछ भी करें); मेरे तो श्रीरामचन्द्रजीकी जूतियाँ ही शरण हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दासका ही है ॥ १ ॥
जग जस भाजन चातक मीना । नेम पेम निज निपुन नबीना ॥ अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ॥
जगत्में यशके पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेमको सदा नया बनाये रखनेमें निपुण हैं। ऐसा मनमें सोचते हुए भरतजी मार्गमें चले जाते हैं। उनके सब अङ्ग संकोच और प्रेमसे शिथिल हो रहे हैं ॥ २ ॥
फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी । चलत भगति बल धीरज धोरी ॥ जब समुद्धत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ॥
माताकी की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी भक्तिके बलसे चले जाते हैं। जब श्रीरघुनाथजीके स्वभावको समझते (स्मरण करते) हैं तब मार्गमें उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं ॥ ३ ॥
भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी ॥ देखि भरत कर सोचु सनेहू । भा निषाद तेहि समर्य बिदेहू ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५३१
उस समय भरतकी दशा कैसी है ? जैसी जलके प्रवाहमें जलके भौरैकी गति होती है । भरतजीका सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया (देहकी सुध-बुध भूल गया) ॥ ४ ॥
दो०— लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु ।
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु ॥ २३४ ॥
मङ्गल-शकुन होने लगे । उन्हें सुनकर और विचारकर निषाद कहने लगा—सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर फिर अन्तमें दुःख होगा ॥ २३४ ॥
सेवक बचन सत्य सब जाने । आश्रम निकट जाइ निअराने ॥
भरत दीख बन सैल समाजू । मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू ॥
भरतजीने सेवक (गुह) के सब बचन सत्य जाने और वे आश्रमके समीप जा पहुँचे । वहाँके वन और पर्वतोंके समूहको देखा तो भरतजी इतने आनन्दित हुए मानो कोई भूखा अच्छा अन्न (भोजन) पा गया हो ॥ १ ॥
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी । त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी ॥
जाइ सुराज सुदेस सुखारी । होहिं भरत गति तेहि अनुहारी ॥
जैसे ईतिके भयसे दुःखी हुई और तीनों (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक) तापों तथा क्रूर ग्रहों और महामारियोंसे पीड़ित प्रजा किसी उत्तम देश और उत्तम राज्यमें जाकर सुखी हो जाय, भरतजीकी गति (दशा) ठीक उसी प्रकारकी हो रही है ॥ २ ॥
[अधिक जल बरसना, न बरसना, चूहोंका उत्पात, टिड़ियाँ, तोते और दूसरे राजाकी चढ़ाई—खेतोंमें बाधा देनेवाले इन छः उपद्रवोंको 'ईति' कहते हैं ।]
राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ॥
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू । बिपिन सुहावन पावन देसू ॥
श्रीरामचन्द्रजीके निवाससे वनकी सम्पत्ति ऐसी सुशोभित है मानो अच्छे राजाको पाकर प्रजा सुखी हो । सुहावना वन ही पवित्र देश है । विवेक उसका राजा है और वैराग्य मन्त्री है ॥ ३ ॥
भट जम नियम सैल रजधानी । सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ॥
सकल अंग संपन्न सुराऊ । राम चरन आश्रित चित चाऊ ॥
यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) तथा नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योद्धा हैं । पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियाँ हैं । वह श्रेष्ठ राजा राज्यके सब अङ्गोंसे पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके आश्रित रहनेसे उसके चितमें चाव (आनन्द या उत्साह) है ॥ ४ ॥
[स्वामी, अमात्य, सुहृद, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना—राज्यके ये सात अङ्ग हैं ।]
५४०
- रामचरितमानस *
दो०— जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुर् सुरख संपदा सुकालु ॥ २३५ ॥
मोहरूपी राजाको सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कण्टक राज्य कर रहा है। उसके नगरमें सुख, सम्पत्ति और सुकाल वर्तमान हैं ॥ २३५ ॥
बन प्रदेश मुनि बास घनैरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खैरे ॥
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना ॥
वनरूपी प्रान्तोंमें जो मुनियोंके बहुत-से निवासस्थान हैं वही मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ोंका समूह है। बहुत-से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रजाओंका समाज है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १ ॥
खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा ॥
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥
गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैलोंको देखकर राजाके साजको सराहते ही बनता है। ये सब आपसका वैर छोड़कर जहाँ-तहाँ एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरङ्गिणी सेना है ॥ २ ॥
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं ॥
चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन ॥
पानीके झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिघाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहाँ अनेकों प्रकारके नगाड़े बज रहे हैं। चक्का, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलोंके समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मनसे कूज रहे हैं ॥ ३ ॥
अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा ॥
बेलि बिटप तून सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला ॥
भौरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्यमें चारों ओर मङ्गल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तूण सब फल और फूलोंसे युक्त हैं। सारा समाज आनन्द और मङ्गलका मूल बन रहा है ॥ ४ ॥
दो०— राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ॥ २३६ ॥
श्रीरामजीके पर्वतकी शोभा देखकर भरतजीके हृदयमें अत्यन्त प्रेम हुआ। जैसे तपस्वी नियमकी समाप्ति होनेपर तपस्याका फल पाकर सुखी होता है ॥ २३६ ॥
मासपारायण, बीसवाँ विश्राम
नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम
- अयोध्याकाण्ड *
५४१
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥ नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥
तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजीसे कहने लगा—हे नाथ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमालके विशाल वृक्ष दिखायी देते हैं, ॥ १ ॥
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥ नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥
जिन श्रेष्ठ वृक्षोंके बीचमें एक सुन्दर विशाल बड़का वृक्ष सुशोभित है, जिसको देखकर मन मोहित हो जाता है, उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं। उसकी घनी छाया सब ऋतुओंमें सुख देनेवाली है ॥ २ ॥
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥ ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई॥
मानो ब्रह्माजीने परम शोभाको एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि-सी रच दी है। हे गुसाई! ये वृक्ष नदीके समीप हैं, जहाँ श्रीरामकी पर्णकुटी छायी है ॥ ३ ॥
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहूँ कहूँ सियँ कहूँ लखन लगाए॥ बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई॥
वहाँ तुलसीजीके बहुत-से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं-कहीं सीताजीने और कहीं लक्ष्मणजीने लगाये हैं। इसी बड़की छायामें सीताजीने अपने करकमलोंसे सुन्दर वेदी बनायी है ॥ ४ ॥
दो०— जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान। सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥ २३७ ॥
जहाँ सुजान श्रीसीतारामजी मुनियोंके वृन्दसमेत बैठकर नित्य शास्त्र, वेद और पुराणोंके सब कथा-इतिहास सुनते हैं ॥ २३७ ॥
सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥ करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥
सखाके वचन सुनकर और वृक्षोंको देखकर भरतजीके नेत्रोंमें जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेमका वर्णन करनेमें सरस्वतीजी भी सकुचाती हैं ॥ १ ॥
हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥ रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥
५४२
- रामचरितमानस *
श्रीरामचन्द्रजीके चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस पा गया हो। वहाँकी रजको मस्तकपर रखकर हृदयमें और नेत्रोंमें लगाते हैं और श्रीरघुनाथजीके मिलनेके समान सुख पाते हैं ॥ २ ॥
देखि भरत गति अकथ अतीवा । प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा ॥ सखहि सनेह बिबस मग भूला । कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला ॥
भरतजीकी अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वनके पशु, पक्षी और जड़ (वृक्षादि) जीव प्रेममें मग्न हो गये। प्रेमके विशेष वश होनेसे सखा निषादराजको भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे ॥ ३ ॥
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे । सहज सनेहु सराहन लागे ॥ होत न भूतल भाउ भरत को । अचर सचर चर अचर करत को ॥
भरतके प्रेमकी इस स्थितिको देखकर सिद्ध और साधकलोग भी अनुरागसे भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेमकी प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतलपर भरतका जन्म [अथवा प्रेम] न होता, तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन करता? ॥ ४ ॥
दो०—प्रेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर ।
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥ २३८ ॥
प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने देवता और साधुओंके हितके लिये स्वयं [इस भरतरूपी गहरे समुद्रको अपने विरहरूपी मन्दराचलसे] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है ॥ २३८ ॥
सखा समेत मनोहर जोटा । लखेउ न लखन सघन बन ओटा ॥
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन । सकल सुमंगल सदनु सुहावन ॥
सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको सघन बनकी आड़के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समस्त सुमङ्गलोंके धाम और सुन्दर पवित्र आश्रमको देखा ॥ १ ॥
करत प्रबेस मिटे दुख दावा । जनु जोगीं परमारथु पावा ॥
देखे भरत लखन प्रभु आगे । पूछे बचन कहत अनुरागे ॥
आश्रममें प्रवेश करते ही भरतजीका दुःख और दाह (जलन) मिट गया, मानो योगीको परमार्थ (परमतत्त्व) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजीने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभुके आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं (पूछी हुई बातका प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं) ॥ २ ॥
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें । तून कसें कर सरु धनु काँधें ॥
बेदी पर मुनि साधु समाजू । सीय सहित राजत रघुराजू ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५४३
सिरपर जटा है। कमरमें मुनियोंका (वलकल) वस्त्र बाँधे हैं और उसीमें तरकस कसे हैं। हाथमें बाण तथा कंधेपर धनुष है। वेदीपर मुनि तथा साधुओंका समुदाय बैठा है और सीताजीसहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं ॥ ३ ॥
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा । जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा ॥ कर कमलनि धनु सायकु फेरत । जिय की जरनि हरत हँसि हेरत ॥
श्रीरामजीके बलकल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [सीतारामजी ऐसे लगते हैं] मानो रति और कामदेवने मुनिका वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जीकी जलन हर लेते हैं (अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसीको परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है।) ॥ ४ ॥
दो०—लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु । ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु ॥ २३९ ॥
सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं ॥ २३९ ॥
सानुज सखा समेत मगन मन । बिसरे हरष सोक सुख दुख गन ॥ पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई । भूतल परे लकुट की नाई ॥
छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराजसमेत भरतजीका मन [प्रेममें] मग्न हो रहा है। हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये। 'हे नाथ ! रक्षा कीजिये, हे गुसाई ! रक्षा कीजिये' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर दण्डकी तरह गिर पड़े ॥ १ ॥
बचन सपेम लखन पहिचाने । करत प्रनामु भरत जियँ जाने ॥ बंधु सनेह सरस एहि ओरा । उत साहिब सेवा बस जोरा ॥
प्रेमभरे वचनोंसे लक्ष्मणजीने पहचान लिया और मनमें जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। [वे श्रीरामजीकी ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ-पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं।] अब इस ओर तो भाई भरतजीका सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजीकी सेवाकी प्रबल परवशता ॥ २ ॥
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई । सुकबि लखन मन की गति भनई ॥ रहे राखि सेवा पर भास् । चढ़ी चंग जनु खैँच खेलास् ॥
५४४
- रामचरितमानस *
न तो [क्षणभरके लिये भी सेवासे पृथक् होकर] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश] छोड़ते (उपेक्षा करते) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजीके चित्तकी इस गति (दुविधा) का वर्णन कर सकता है। वे सेवापर भार रखकर रह गये (सेवाको ही विशेष महत्वपूर्ण समझकर उसीमें लगे रहे) मानो चढ़ी हुई पतंगको खिलाड़ी (पतंग उड़ानेवाला) खींच रहा हो ॥ ३ ॥
कहत सप्रेम नाइ महि माथा । भरत प्रनाम करत रघुनाथा ॥ उठे रामु सुनि पेम अधीरा । कहँ पट कहँ निषंग धनु तीरा ॥
लक्ष्मणजीने प्रेमसहित पृथ्वीपर मस्तक नवाकर कहा—हे रघुनाथजी ! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेममें अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण ॥ ४ ॥
दो०—बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान ।
भरत राम की मिलनि लिख बिसरे सबहि अपान ॥ २४० ॥
कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया। भरतजी और श्रीरामजीके मिलनेकी रीतिको देखकर सबको अपनी सुध भूल गयीं ॥ २४० ॥
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कबिकुल अगम करम मन बानी ॥ परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥
मिलनकी प्रीति कैसे बखानी जाय? वह तो कविकुलके लिये कर्म, मन, वाणी तीनोंसे अगम है। दोनों भाई (भरतजी और श्रीरामजी) मन, बुद्धि, चित और अहंकारको भुलाकर परम प्रेमसे पूर्ण हो रहे हैं ॥ १ ॥
कहहु सुपेम प्रगट को करई । केहि छाया कबि मति अनुसरई ॥ कबिहि अरथ आखर बलु साँचा । अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा ॥
कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेमको कौन प्रकट करे? कविकी बुद्धि किसकी छायाका अनुसरण करे? कविको तो अक्षर और अर्थका ही सच्चा बल है। नट तालकी गतिके अनुसार ही नाचता है! ॥ २ ॥
अगम सनेह भरत रघुबर को । जहाँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को ॥ सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती । बाज सुराग कि गाँडर ताँती ॥
भरतजी और श्रीरघुनाथजीका प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेमको मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडरकी ताँतसे भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है? ॥ ३ ॥
[तालाबों और झीलोंमें एक तरहकी घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं।]
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की । सुरगन सभय धकधकी धरकी ॥ समुझ्नाए सुरगुरु जड़ जागे । बरषि प्रसून प्रसंसन लागे ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५४५
भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके मिलनेका ढंग देखकर देवता भयभीत हो गये, उनकी धुकधुकी धड़कने लगी। देवगुरु बृहस्पतिजीने समझाया, तब कहीं वे मूर्ख चेते और फूल बरसाकर प्रशंसा करने लगे ॥ ४ ॥
दो०—मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम ॥ २४१ ॥
फिर श्रीरामजी प्रेमके साथ शत्रुघ्नसे मिलकर तब केवट (निषादराज) से मिले। प्रणाम करते हुए लक्ष्मणजीसे भरतजी बड़े ही प्रेमसे मिले ॥ २४१ ॥
भेंटेउ लखन ललकि लधु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥
तब लक्ष्मणजी ललककर (बड़ी उमंगके साथ) छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले। फिर उन्होंने निषादराजको हृदयसे लगा लिया। फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयोंने [उपस्थित] मुनियोंको प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए ॥ १ ॥
सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए॥
छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरतजी प्रेममें उमँगकर सीताजीके चरणकमलोंकी रज सिरपर धारणकर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताजीने उन्हें उठाकर उनके सिरको अपने करकमलसे स्पर्शकर (सिरपर हाथ फेरकर) उन दोनोंको बैठाया ॥ २ ॥
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाही॥
सब बिधि सानुकूल लिखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता॥
सीताजीने मन-ही-मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेहमें मग्न हैं, उन्हें देहकी सुध-बुध नहीं है। सीताजीको सब प्रकारसे अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोचरहित हो गये और उनके हृदयका कल्पित भय जाता रहा ॥ ३ ॥
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा॥
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥
उस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेमसे परिपूर्ण है, वह अपनी गतिसे खाली है (अर्थात् संकल्प-विकल्प और चाञ्चल्यसे शून्य है)। उस अवसरपर केवट (निषादराज) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा— ॥ ४ ॥
दो०—नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग ॥ २४२ ॥
५४६
- रामचरितमानस *
हे नाथ! मुनिनाथ वसिष्ठजीके साथ सब माताएँ, नगरनिवासी, सेवक, सेनापति, मन्त्री—सब आपके वियोगसे व्याकुल होकर आये हैं ॥ २४२ ॥
सीलसिंधु सुनि गुर आगवन् । सिय समीप राखे रिपुदवन् ॥ चले सबेग रामु तेहि काला । धीर धरम धुर दीनदयाला ॥
गुरुका आगमन सुनकर शीलके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीके पास शत्रुघ्नजीको रख दिया और वे परम धीर, धर्मधुरन्धर, दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेगके साथ चल पड़े ॥ १ ॥
गुरहि देखि सानुज अनुरागे । दंड प्रनाम करन प्रभु लागे ॥ मुनिबर धाइ लिए उर लाई । प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई ॥
गुरुजीके दर्शन करके लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी प्रेममें भर गये और दण्डवत् प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दौड़कर उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रेममें उमगकर वे दोनों भाइयोंसे मिले ॥ २ ॥
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू । कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू ॥ रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा ॥
फिर प्रेमसे पुलकित होकर केवट (निषादराज) ने अपना नाम लेकर दूरसे ही वसिष्ठजीको दण्डवत् प्रणाम किया। ऋषि वसिष्ठजीने रामसखा जानकर उसको जबर्दस्ती हृदयसे लगा लिया। मानो जमीनपर लोटते हुए प्रेमको समेट लिया हो ॥ ३ ॥
रघुपति भगति सुमंगल मूला । नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला ॥ एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं ॥
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुन्दर मङ्गलोंका मूल है, इस प्रकार कहकर सराहना करते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे—जगत्में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजीके समान बड़ा कौन हैं? ॥ ४ ॥
दो०— जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ । सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ ॥ २४३ ॥
जिस (निषाद) को देखकर मुनिराज वसिष्ठजी लक्ष्मणजीसे भी अधिक उससे आनन्दित होकर मिले। यह सब सीतापति श्रीरामचन्द्रजीके भजनका प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है ॥ २४३ ॥
आरत लोग राम सबु जाना । करुनाकर सुजान भगवाना ॥ जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी । तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५४७
दयाकी खान, सुजान भगवान् श्रीरामजीने सब लोगोंको दुखी (मिलनेके लिये व्याकुल) जाना। तब जो जिस भावसे मिलनेका अभिलाषी था, उस-उसका उस-उस प्रकारका रुख रखते हुए (उसकी रुचिके अनुसार) ॥ १ ॥
सानुज मिलि पल महुँ सब काहू । कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू ॥ यह बड़ि बात राम कै नाहीं । जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं ॥
उन्होंने लक्ष्मणजीसहित पलभरमें सब किसीसे मिलकर उनके दुःख और कठिन संतापको दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घड़ोंमें एक ही सूर्यकी [पृथक्-पृथक्] छाया (प्रतिबिम्ब) एक साथ ही दीखती है ॥ २ ॥
मिलि केवटहि उमगि अनुरागा । पुरजन सकल सराहहिं भागा ॥ देखीं राम दुखित महतारीं । जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं ॥
समस्त पुरवासी प्रेममें उमँगकर केवटसे मिलकर [उसके] भाग्यकी सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीने सब माताओंको दुखी देखा। मानो सुन्दर लताओंकी पंक्तियोंको पाला मार गया हो ॥ ३ ॥
प्रथम राम भेंटी कैकेई । सरल सुभायै भगति मति भेई ॥ पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी । काल करम बिधि सिर धरि खोरी ॥
सबसे पहले रामजी कैकेयीसे मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्तिसे उसकी बुद्धिको तर कर दिया। फिर चरणोंमें गिरकर काल, कर्म और विधाताके सिर दोष मँढ़कर, श्रीरामजीने उनको सान्त्वना दी ॥ ४ ॥
दो०— भेंटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु । अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु ॥ २४४ ॥
फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओंसे मिले। उन्होंने सबको समझा-बुझाकर सन्तोष कराया कि हे माता! जगत् ईश्वरके अधीन है, किसीको भी दोष नहीं देना चाहिये ॥ २४४ ॥
गुरतिय पद बंदे दुहु भाई । सहित बिप्रतिय जे सँग आई ॥ गंग गौरि सम सब सनमानीं । देहिं असीस मुदित मृदु बानीं ॥
फिर दोनों भाइयोंने ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसहित—जो भरतजीके साथ आयी थीं, गुरुजीकी पत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना की और उन सबका गङ्गाजी तथा गौरीजीके समान सम्मान किया। वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणीसे आशीर्वाद देने लगीं ॥ १ ॥
गहि पद लगे सुमित्रा अंका । जनु भेंटी संपति अति रंका ॥ पुनि जननी चरननि दोउ भ्राता । परे पेम व्याकुल सब गाता ॥
५४८
- रामचरितमानस *
तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजीकी गोदमें जा चिपटे। मानो किसी अत्यन्त दरिद्रको सम्पत्तिसे भेंट हो गयी हो। फिर दोनों भाई माता कौसल्याजीके चरणोंमें गिर पड़े। प्रेमके मारे उनके सारे अंग शिथिल हैं ॥ २ ॥
अति अनुराग अंब उर लाए । नयन सनेह सलिल अन्हवाए ॥ तेहि अवसर कर हरष बिषादू । किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू ॥
बड़े ही स्नेहसे माताने उन्हें हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंसे बहे हुए प्रेमाश्रुओंके जलसे उन्हें नहला दिया। उस समयके हर्ष और विषादको कवि कैसे कहे ? जैसे गूँगा स्वादको कैसे बतावे ? ॥ ३ ॥
मिलि जननिहि सानुज रघुराऊ । गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ ॥ पुरजन पाइ मुनीस नियोगू । जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू ॥
श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित माता कौसल्यासे मिलकर गुरुसे कहा कि आश्रमपर पधारिये। तदनन्तर मुनीश्वर वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर अयोध्यावासी सब लोग जल और थलका सुभीता देख-देखकर उतर गये ॥ ४ ॥
दो०— महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।
पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ ॥ २४५ ॥
ब्राह्मण, मन्त्री, माताएँ और गुरु आदि गिने-चुने लोगोंको साथ लिये हुए, भरतजी, लक्ष्मणजी और श्रीरघुनाथजी पवित्र आश्रमको चले ॥ २४५ ॥
सीय आइ मुनिबर पग लागी । उचित असीस लही मन मागी ॥ गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता । मिली पेमु कहि जाइ न जेता ॥
सीताजी आकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके चरणों लगीं और उन्होंने मनमाँगो उचित आशिष पायी। फिर मुनियोंकी स्त्रियोंसहित गुरुपत्नी अरुन्धतीजीसे मिलीं। उनका जितना प्रेम था, वह कहा नहीं जाता ॥ १ ॥
बंदि बंदि पग सिय सबही के । आसिरबचन लहे प्रिय जी के ॥ सासु सकल जब सीयँ निहारीं । मूदे नयन सहमि सुकुमारीं ॥
सीताजीने सभीके चरणोंकी अलग-अलग वन्दना करके अपने हृदयको प्रिय (अनुकूल) लगनेवाले आशीर्वाद पाये। जब सुकुमारी सीताजीने सब सासुओंको देखा, तब उन्होंने सहमकर अपनी आँखें बंद कर लीं ॥ २ ॥
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं । काह कीन्ह करतार कुचालीं ॥ तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा । सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा ॥
[सासुओंकी बुरी दशा देखकर] उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो राजहंसिनियाँ बधिकके वशमें पड़ गयी हों। [मनमें सोचने लगीं कि] कुचाली विधाताने क्या कर डाला? उन्होंने भी सीताजीको देखकर बड़ा दुःख पाया। [सोचा] जो कुछ दैव सहावे, वह सब सहना ही पड़ता है ॥ ३ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५४९
जनकसुता तब उर धरि धीरा । नील नलिन लोयन भरि नीरा ॥ मिली सकल सासुन्ह सिय जाई । तेहि अवसर करुना महि छाई ॥
तब जानकीजी हृदयमें धीरज धरकर, नील कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, सब सासुओंसे जाकर मिलीं। उस समय पृथ्वीपर करुणा (करुण-रस) छा गयी ॥ ४ ॥
दो०— लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग ।
हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग ॥ २४६ ॥
सीताजी सबके पैरों लग-लगकर अत्यन्त प्रेमसे मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्नेहवश हृदयसे आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहागसे भरी रहो (अर्थात् सदा सौभाग्यवती रहो) ॥ २४६ ॥
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं । बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ॥ कहि जग गति मायिक मुनिनाथा । कहे कछुक परमारथ गाथा ॥
सीताजी और सब रानियाँ स्नेहेके मारे व्याकुल हैं। तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेके लिये कहा। फिर मुनिनाथ वसिष्ठजीने जगत्की गतिको मायिक कहकर (अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थकी कथाएँ (बातेँ) कहीं ॥ १ ॥
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा । सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा ॥ मरन हेतु निज नेहु बिचारी । भे अति बिकल धीर धुर धारी ॥
तदनन्तर वसिष्ठजीने राजा दशरथजीके स्वर्गगमनकी बात सुनायी, जिसे सुनकर रघुनाथजीने दुःसह दुःख पाया। और अपने प्रति उनके स्नेहको उनके मरनेका कारण विचारकर धीरधुरन्धर श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥ २ ॥
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी । बिलपत लखन सीय सब रानी ॥ सोक बिकल अति सकल समाजू । मानहुँ राजु अकाजेउ आजू ॥
वज्रके समान कठोर, कड़वी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियाँ विलाप करने लगीं। सारा समाज शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गया! मानो राजा आज ही मरे हों ॥ ३ ॥
मुनिबर बहुरि राम समुझाए । सहित समाज सुसरित नहाए ॥ ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा । मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा ॥
फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने श्रीरामजीको समझाया। तब उन्होंने समाजसहित श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीजीमें स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निर्जल व्रत किया। मुनि वसिष्ठजीके कहनेपर भी किसीने जल ग्रहण नहीं किया ॥ ४ ॥
५५०
- रामचरितमानस *
दो०—भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह ॥ २४७ ॥
दूसरे दिन सबेरा होनेपर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीको जो-जो आज्ञा दी, वह सब कार्य प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने श्रद्धा-भक्तिसहित आदरके साथ किया ॥ २४७ ॥
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी । भे पुनीत पातक तम तरनी ॥ जासु नाम पावक अघ तूला । सुमिरत सकल सुमंगल मूला ॥
वेदोंमें जैसा कहा गया है, उसीके अनुसार पिताकी क्रिया करके, पापरूपी अन्धकारके नष्ट करनेवाले सूर्यरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए! जिनका नाम पापरूपी रूढ़िके [तुरंत जला डालनेके] लिये अग्नि है; और जिनका स्मरणमात्र समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है, ॥ १ ॥
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस । तीरथ आवाहन सुरसरि जस ॥ सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते । बोले गुर सन राम पिरीते ॥
वे [नित्य शुद्ध-बुद्ध] भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए। साधुओंकी ऐसी सम्मति है कि उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसा तीर्थोंके आवाहनसे गङ्गाजी शुद्ध होती हैं! (गङ्गाजी तो स्वभावसे ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थोंका आवाहन किया जाता है उलटे वे ही गङ्गाजीके सम्पर्कमें आनेसे शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संसर्गसे कर्म ही शुद्ध हो गये।) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीतिके साथ गुरुजीसे बोले— ॥ २ ॥
नाथ लोग सब निपट दुखारी । कंद मूल फल अंबु अहारी ॥ सानुज भरतु सचिव सब माता । देखि मोहि पल जिमि जुग जाता ॥
हे नाथ! सब लोग यहाँ अत्यन्त दुखी हो रहे हैं। कन्द, मूल, फल और जलका ही आहार करते हैं। भाई शत्रुघ्नसहित भरतको, मन्त्रियोंको और सब माताओंको देखकर मुझे एक-एक पल युगके समान बीत रहा है ॥ ३ ॥
सब समेत पुर धारिअ पाऊ । आपु इहाँ अमरावति राऊ ॥ बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई । उचित होइ तस करिअ गोसाईं ॥
अतः सबके साथ आप अयोध्यापुरीको पधारिये (लौट जाइये)। आप यहाँ हैं, और राजा अमरावती (स्वर्ग) में हैं (अयोध्या सूनी है)! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी ढिठाई की है। हे गोसाईं! जैसा उचित हो, वैसा ही कीजिये ॥ ४ ॥
दो०—धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दस देखि लहहुँ बिश्राम ॥ २४८ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५५१
[वसिष्ठजीने कहा—] हे राम! तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो ? लोग दुखी हैं। दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें॥ २४८॥
राम बचन सुनि सभय समाजु । जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजु॥ सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला । भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥
श्रीरामजीके वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्रमें जहाज डगमगा गया हो। परन्तु जब उन्होंने गुरु वसिष्ठजीकी श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी, तो उस जहाजके लिये मानो हवा अनुकूल हो गयी॥ १ ॥
पावन पर्यै तिहुँ काल नहाहीं । जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं॥ मंगलमूरति लोचन भरि भरि । निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥
सब लोग पवित्र पर्यस्विनी नदीमें [अथवा पर्यस्विनी नदीके पवित्र जलमें] तीनों समय (सबेरे, दोपहर और सायंकाल) स्नान करते हैं, जिसके दर्शनसे ही पापोंके समूह नष्ट हो जाते हैं और मङ्गलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजीको दण्डवत् प्रणाम कर-करके उन्हें नेत्र भर-भरकर देखते हैं॥ २ ॥
राम सैल बन देखन जाहीं । जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥ झरना झरहिं सुधासम बारी । त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी॥
सब श्रीरामचन्द्रजीके पर्वत (कामदगिरि) और वनको देखने जाते हैं, जहाँ सभी सुख हैं और सभी दुःखोंका अभाव है। झरने अमृतके समान जल झरते हैं और तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्ध) हवा तीनों प्रकारके (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) तापोंको हर लेती है॥ ३ ॥
बिटप बेलि तून अगनित जाती । फल प्रसून पल्लव बहु भाँती॥ सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं । जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥
असंख्य जातिके वृक्ष, लताएँ और तृण हैं तथा बहुत तरहके फल, फूल और पत्ते हैं। सुन्दर शिलाएँ हैं। वृक्षोंकी छाया सुख देनेवाली है। वनकी शोभा किससे वर्णन की जा सकती है ?॥ ४ ॥
दो०—सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भूंग । बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥ २४९॥
तालाबोंमें कमल खिल रहे हैं, जलके पक्षी कूज रहे हैं, और गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगोंके पक्षी और पशु वनमें वैररहित होकर विहार कर रहे हैं॥ २४९॥
कोल किरात भिल्ल बनबासी । मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥ भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी । कंद मूल फल अंकुर जूरी॥
५५२
- रामचरितमानस *
कोल, किरात और भील आदि वनके रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृतके समान स्वादिष्ट मधु (शहद) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर-भरकर तथा कन्द, मूल, फल और अंकुर आदिकी जूड़ियों (ऑटियों) को ॥ १ ॥
सबहि देहिं करि विनय प्रनामा । कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ॥ देहिं लोग बहु मोल न लेहीं । फेरत राम दोहाई देहीं ॥
सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजोंके अलग-अलग स्वाद, भेद (प्रकार), गुण और नाम बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा देनेमें श्रीरामजीकी दुहाई देते हैं ॥ २ ॥
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी । मानत साधु पेम पहिचानी ॥ तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा । पावा दरसनु राम प्रसादा ॥
प्रेममें मग्न हुए वे कोमल वाणीसे कहते हैं कि साधु लोग प्रेमको पहचानकर उसका सम्मान करते हैं (अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेमको देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेमका तिरस्कार न कीजिये)। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजीकी कृपासे ही हमने आपलोगोंके दर्शन पाये हैं ॥ ३ ॥
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा । जस मरु धरनि देवधुनि धारा ॥ राम कृपाल निषाद नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ॥
हमलोगोंको आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमिके लिये गङ्गाजीकी धारा दुर्लभ है! [देखिये,] कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने निषादपर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजाको भी होना चाहिये ॥ ४ ॥
दो०— यह जियँ जानि संकोचु तजि करिअ छोहु लिखि नेहु।
हमहि कृतारथ करन लागि फल तून अंकुर लेहु ॥ २५० ॥
हृदयमें ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करनेके लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये ॥ २५० ॥
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे । सेवा जोगु न भाग हमारे ॥ देब काह हम तुम्हहि गोसाँई । ईधनु पात किरात मितार्ई ॥
आप प्रिय पाहुने वनमें पथारे हैं। आपकी सेवा करनेके योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं। हे स्वामी! हम आपको क्या देंगे? भीलोंकी मित्रता तो बस, ईधन (लकड़ी) और पत्तोहीतक है ॥ १ ॥
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई । लेहिं न बासन बसन चोराई ॥ हम जड़ जीव जीव गन घाती । कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५५३
हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते। हमलोग जड़ जीव हैं, जीवोंकी हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं ॥ २ ॥
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं ॥ सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ ॥
हमारे दिन-रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारी कमरमें कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं। हममें स्वप्रमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसी? यह सब तो श्रीरघुनाथजीके दर्शनका प्रभाव है ॥ ३ ॥
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे ॥ बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे ॥
जबसे प्रभुके चरणकमल देखे, तबसे हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये। वनवासियोंके वचन सुनकर अयोध्याके लोग प्रेममें भर गये और उनके भाग्यकी सराहना करने लगे ॥ ४ ॥
छं०—लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं। बोलनि मिलनि सियराम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं ॥ नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा ॥
सब उनके भाग्यकी सराहना करने लगे और प्रेमके वचन सुनाने लगे। उन लोगोंके बोलने और मिलनेका ढंग तथा श्रीसीतारामजीके चरणोंमें उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल-भिल्लोंकी वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेमका निरादर करते हैं (उसे धिक्कार देते हैं)। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा है कि लोहा नौकाको अपने ऊपर लेकर तैर गया।
सो०—बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम ॥ २५१ ॥
सब लोग दिनोंदिन परम आनन्दित होते हुए बनमें चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली वर्षाके जलसे मेढक और मोर मोटे हो जाते हैं (प्रसन्न होकर नाचते-कूदते हैं) ॥ २५१ ॥
पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती ॥ सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई ॥
अयोध्यापुरीके पुरुष और स्त्री सभी प्रेममें अत्यन्त मग्न हो रहे हैं। उनके दिन पलके समान बीत जाते हैं। जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष (रूप) बनाकर सीताजी सब सासुओंकी आदरपूर्वक एक-सी सेवा करती हैं ॥ १ ॥
५५४
- रामचरितमानस *
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ॥ सीयँ सासु सेवा बस कीन्हौँ। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हौँ॥
श्रीरामचन्द्रजीके सिवा इस भेदको और किसीने नहीं जाना। सब मायाएँ [पराशक्ति महामाया] श्रीसीताजीकी मायामें ही हैं। सीताजीने सासुओंको सेवासे वशमें कर लिया। उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिये॥ २॥
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई॥ अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई॥
सीताजीसमेत दोनों भाइयों (श्रीराम-लक्ष्मण) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायी। वह पृथ्वी तथा यमराजसे याचना करती है, किन्तु धरती बीच (फटकर समा जानेके लिये रास्ता) नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता॥ ३॥
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं॥ यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं॥
लोक और वेदमें प्रसिद्ध है और कवि (ज्ञानी) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजीसे विमुख हैं उन्हें नरकमें भी ठौर नहीं मिलती। सबके मनमें यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचन्द्रजीका अयोध्या जाना होगा या नहीं॥ ४॥
दो०—निमि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच॥ २५२॥
भरतजीको न तो रातको नींद आती है, न दिनमें भूख ही लगती है। वे पवित्र सोचमें ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे (तल) के कीचड़में डूबी हुई मछलीको जलकी कमीसे व्याकुलता होती है॥ २५२॥
कीन्हि मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली॥ केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥
[भरतजी सोचते हैं कि] माताके मिससे कालने कुचाल की है। जैसे धानके पकते समय ईतिका भय आ उपस्थित हो। अब श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझ पड़ता॥ १॥
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी॥ मातु कहेहुँ बहरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ॥
- अयोध्याकाण्ड *
५५५
गुरुजीकी आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्याको लौट चलेंगे। परन्तु मुनि वसिष्ठजी तो श्रीरामचन्द्रजीकी रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे (अर्थात् वे श्रीरामजीकी रुचि देखे बिना जानेको नहीं कहेंगे)। माता कौसल्याजीके कहनेसे भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजीको जन्म देनेवाली माता क्या कभी हठ करेगी? ॥ २ ॥
मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महाँ कुसमउ बाम बिधाता ॥ जौँ हठ करउँ त निपट कुकरम् । हरगिरि तें गुरु सेवक धरम् ॥
मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है (मेरे दिन अच्छे नहीं हैं) और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म (अधर्म) होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी (निबाहनेमें कठिन) है ॥ ३ ॥
एकउ जुगुति न मन ठहरानी । सोचत भरतहि रैन बिहानी ॥ प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई । बैठत पठए रिषयँ बोलाई ॥
एक भी युक्ति भरतजीके मनमें न ठहरी। सोचते—ही—सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजीने उनको बुलवा भेजा ॥ ४ ॥
दो०—गुरु पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ॥ २५३ ॥
भरतजी गुरुके चरणकमलोंमें प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये ॥ २५३ ॥
बोले मुनिबरु समय समाना । सुनुहु सभासद भरत सुजाना ॥ धरम धुरीन भानुकुल भानू । राजा रामु स्वबस भगवान् ॥
श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले—हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुलके सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं ॥ १ ॥
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू । राम जनमु जग मंगल हेतू ॥ गुर पितु मातु बचन अनुसारि । खल दलु दलन देव हितकारी ॥
वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं। श्रीरामजीका अवतार ही जगत्के कल्याणके लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माताके वचनोंके अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टोंके दलका नाश करनेवाले और देवताओंके हितकारी हैं ॥ २ ॥
नीति प्रीति परमारथ स्वार्थु । कोउ न राम सम जान जथारथु ॥
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥