श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
हे नाथ! मुनिनाथ वसिष्ठजीके साथ सब माताएँ, नगरनिवासी, सेवक, सेनापति, मन्त्री—सब आपके वियोगसे व्याकुल होकर आये हैं ॥ २४२ ॥
सीलसिंधु सुनि गुर आगवन् । सिय समीप राखे रिपुदवन् ॥ चले सबेग रामु तेहि काला । धीर धरम धुर दीनदयाला ॥
गुरुका आगमन सुनकर शीलके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीके पास शत्रुघ्नजीको रख दिया और वे परम धीर, धर्मधुरन्धर, दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेगके साथ चल पड़े ॥ १ ॥
गुरहि देखि सानुज अनुरागे । दंड प्रनाम करन प्रभु लागे ॥ मुनिबर धाइ लिए उर लाई । प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई ॥
गुरुजीके दर्शन करके लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी प्रेममें भर गये और दण्डवत् प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दौड़कर उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रेममें उमगकर वे दोनों भाइयोंसे मिले ॥ २ ॥
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू । कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू ॥ रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा ॥
फिर प्रेमसे पुलकित होकर केवट (निषादराज) ने अपना नाम लेकर दूरसे ही वसिष्ठजीको दण्डवत् प्रणाम किया। ऋषि वसिष्ठजीने रामसखा जानकर उसको जबर्दस्ती हृदयसे लगा लिया। मानो जमीनपर लोटते हुए प्रेमको समेट लिया हो ॥ ३ ॥
रघुपति भगति सुमंगल मूला । नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला ॥ एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं ॥
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुन्दर मङ्गलोंका मूल है, इस प्रकार कहकर सराहना करते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे—जगत्में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजीके समान बड़ा कौन हैं? ॥ ४ ॥
दो०— जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ । सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ ॥ २४३ ॥
जिस (निषाद) को देखकर मुनिराज वसिष्ठजी लक्ष्मणजीसे भी अधिक उससे आनन्दित होकर मिले। यह सब सीतापति श्रीरामचन्द्रजीके भजनका प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है ॥ २४३ ॥
आरत लोग राम सबु जाना । करुनाकर सुजान भगवाना ॥ जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी । तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी ॥