भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 549
  • अयोध्याकाण्ड *

५४७

दयाकी खान, सुजान भगवान् श्रीरामजीने सब लोगोंको दुखी (मिलनेके लिये व्याकुल) जाना। तब जो जिस भावसे मिलनेका अभिलाषी था, उस-उसका उस-उस प्रकारका रुख रखते हुए (उसकी रुचिके अनुसार) ॥ १ ॥

सानुज मिलि पल महुँ सब काहू । कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू ॥ यह बड़ि बात राम कै नाहीं । जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं ॥

उन्होंने लक्ष्मणजीसहित पलभरमें सब किसीसे मिलकर उनके दुःख और कठिन संतापको दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घड़ोंमें एक ही सूर्यकी [पृथक्-पृथक्] छाया (प्रतिबिम्ब) एक साथ ही दीखती है ॥ २ ॥

मिलि केवटहि उमगि अनुरागा । पुरजन सकल सराहहिं भागा ॥ देखीं राम दुखित महतारीं । जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं ॥

समस्त पुरवासी प्रेममें उमँगकर केवटसे मिलकर [उसके] भाग्यकी सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीने सब माताओंको दुखी देखा। मानो सुन्दर लताओंकी पंक्तियोंको पाला मार गया हो ॥ ३ ॥

प्रथम राम भेंटी कैकेई । सरल सुभायै भगति मति भेई ॥ पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी । काल करम बिधि सिर धरि खोरी ॥

सबसे पहले रामजी कैकेयीसे मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्तिसे उसकी बुद्धिको तर कर दिया। फिर चरणोंमें गिरकर काल, कर्म और विधाताके सिर दोष मँढ़कर, श्रीरामजीने उनको सान्त्वना दी ॥ ४ ॥

दो०— भेंटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु । अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु ॥ २४४ ॥

फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओंसे मिले। उन्होंने सबको समझा-बुझाकर सन्तोष कराया कि हे माता! जगत् ईश्वरके अधीन है, किसीको भी दोष नहीं देना चाहिये ॥ २४४ ॥

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई । सहित बिप्रतिय जे सँग आई ॥ गंग गौरि सम सब सनमानीं । देहिं असीस मुदित मृदु बानीं ॥

फिर दोनों भाइयोंने ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसहित—जो भरतजीके साथ आयी थीं, गुरुजीकी पत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना की और उन सबका गङ्गाजी तथा गौरीजीके समान सम्मान किया। वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणीसे आशीर्वाद देने लगीं ॥ १ ॥

गहि पद लगे सुमित्रा अंका । जनु भेंटी संपति अति रंका ॥ पुनि जननी चरननि दोउ भ्राता । परे पेम व्याकुल सब गाता ॥