भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 554

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  • रामचरितमानस *

कोल, किरात और भील आदि वनके रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृतके समान स्वादिष्ट मधु (शहद) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर-भरकर तथा कन्द, मूल, फल और अंकुर आदिकी जूड़ियों (ऑटियों) को ॥ १ ॥

सबहि देहिं करि विनय प्रनामा । कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ॥ देहिं लोग बहु मोल न लेहीं । फेरत राम दोहाई देहीं ॥

सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजोंके अलग-अलग स्वाद, भेद (प्रकार), गुण और नाम बता-बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा देनेमें श्रीरामजीकी दुहाई देते हैं ॥ २ ॥

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी । मानत साधु पेम पहिचानी ॥ तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा । पावा दरसनु राम प्रसादा ॥

प्रेममें मग्न हुए वे कोमल वाणीसे कहते हैं कि साधु लोग प्रेमको पहचानकर उसका सम्मान करते हैं (अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेमको देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेमका तिरस्कार न कीजिये)। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजीकी कृपासे ही हमने आपलोगोंके दर्शन पाये हैं ॥ ३ ॥

हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा । जस मरु धरनि देवधुनि धारा ॥ राम कृपाल निषाद नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ॥

हमलोगोंको आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमिके लिये गङ्गाजीकी धारा दुर्लभ है! [देखिये,] कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने निषादपर कैसी कृपा की है। जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजाको भी होना चाहिये ॥ ४ ॥

दो०— यह जियँ जानि संकोचु तजि करिअ छोहु लिखि नेहु।

हमहि कृतारथ करन लागि फल तून अंकुर लेहु ॥ २५० ॥

हृदयमें ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करनेके लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये ॥ २५० ॥

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे । सेवा जोगु न भाग हमारे ॥ देब काह हम तुम्हहि गोसाँई । ईधनु पात किरात मितार्ई ॥

आप प्रिय पाहुने वनमें पथारे हैं। आपकी सेवा करनेके योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं। हे स्वामी! हम आपको क्या देंगे? भीलोंकी मित्रता तो बस, ईधन (लकड़ी) और पत्तोहीतक है ॥ १ ॥

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई । लेहिं न बासन बसन चोराई ॥ हम जड़ जीव जीव गन घाती । कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ॥