भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 553
  • अयोध्याकाण्ड *

५५१

[वसिष्ठजीने कहा—] हे राम! तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो ? लोग दुखी हैं। दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें॥ २४८॥

राम बचन सुनि सभय समाजु । जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजु॥ सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला । भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥

श्रीरामजीके वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्रमें जहाज डगमगा गया हो। परन्तु जब उन्होंने गुरु वसिष्ठजीकी श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी, तो उस जहाजके लिये मानो हवा अनुकूल हो गयी॥ १ ॥

पावन पर्यै तिहुँ काल नहाहीं । जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं॥ मंगलमूरति लोचन भरि भरि । निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥

सब लोग पवित्र पर्यस्विनी नदीमें [अथवा पर्यस्विनी नदीके पवित्र जलमें] तीनों समय (सबेरे, दोपहर और सायंकाल) स्नान करते हैं, जिसके दर्शनसे ही पापोंके समूह नष्ट हो जाते हैं और मङ्गलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजीको दण्डवत् प्रणाम कर-करके उन्हें नेत्र भर-भरकर देखते हैं॥ २ ॥

राम सैल बन देखन जाहीं । जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥ झरना झरहिं सुधासम बारी । त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी॥

सब श्रीरामचन्द्रजीके पर्वत (कामदगिरि) और वनको देखने जाते हैं, जहाँ सभी सुख हैं और सभी दुःखोंका अभाव है। झरने अमृतके समान जल झरते हैं और तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्ध) हवा तीनों प्रकारके (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) तापोंको हर लेती है॥ ३ ॥

बिटप बेलि तून अगनित जाती । फल प्रसून पल्लव बहु भाँती॥ सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं । जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥

असंख्य जातिके वृक्ष, लताएँ और तृण हैं तथा बहुत तरहके फल, फूल और पत्ते हैं। सुन्दर शिलाएँ हैं। वृक्षोंकी छाया सुख देनेवाली है। वनकी शोभा किससे वर्णन की जा सकती है ?॥ ४ ॥

दो०—सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भूंग । बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥ २४९॥

तालाबोंमें कमल खिल रहे हैं, जलके पक्षी कूज रहे हैं, और गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगोंके पक्षी और पशु वनमें वैररहित होकर विहार कर रहे हैं॥ २४९॥

कोल किरात भिल्ल बनबासी । मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी॥ भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी । कंद मूल फल अंकुर जूरी॥