भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 544

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  • रामचरितमानस *

श्रीरामचन्द्रजीके चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस पा गया हो। वहाँकी रजको मस्तकपर रखकर हृदयमें और नेत्रोंमें लगाते हैं और श्रीरघुनाथजीके मिलनेके समान सुख पाते हैं ॥ २ ॥

देखि भरत गति अकथ अतीवा । प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा ॥ सखहि सनेह बिबस मग भूला । कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला ॥

भरतजीकी अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वनके पशु, पक्षी और जड़ (वृक्षादि) जीव प्रेममें मग्न हो गये। प्रेमके विशेष वश होनेसे सखा निषादराजको भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे ॥ ३ ॥

निरखि सिद्ध साधक अनुरागे । सहज सनेहु सराहन लागे ॥ होत न भूतल भाउ भरत को । अचर सचर चर अचर करत को ॥

भरतके प्रेमकी इस स्थितिको देखकर सिद्ध और साधकलोग भी अनुरागसे भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेमकी प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतलपर भरतका जन्म [अथवा प्रेम] न होता, तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन करता? ॥ ४ ॥

दो०—प्रेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर ।

मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥ २३८ ॥

प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने देवता और साधुओंके हितके लिये स्वयं [इस भरतरूपी गहरे समुद्रको अपने विरहरूपी मन्दराचलसे] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है ॥ २३८ ॥

सखा समेत मनोहर जोटा । लखेउ न लखन सघन बन ओटा ॥

भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन । सकल सुमंगल सदनु सुहावन ॥

सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको सघन बनकी आड़के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समस्त सुमङ्गलोंके धाम और सुन्दर पवित्र आश्रमको देखा ॥ १ ॥

करत प्रबेस मिटे दुख दावा । जनु जोगीं परमारथु पावा ॥

देखे भरत लखन प्रभु आगे । पूछे बचन कहत अनुरागे ॥

आश्रममें प्रवेश करते ही भरतजीका दुःख और दाह (जलन) मिट गया, मानो योगीको परमार्थ (परमतत्त्व) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजीने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभुके आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं (पूछी हुई बातका प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं) ॥ २ ॥

सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें । तून कसें कर सरु धनु काँधें ॥

बेदी पर मुनि साधु समाजू । सीय सहित राजत रघुराजू ॥

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