भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 545
  • अयोध्याकाण्ड *

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सिरपर जटा है। कमरमें मुनियोंका (वलकल) वस्त्र बाँधे हैं और उसीमें तरकस कसे हैं। हाथमें बाण तथा कंधेपर धनुष है। वेदीपर मुनि तथा साधुओंका समुदाय बैठा है और सीताजीसहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं ॥ ३ ॥

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा । जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा ॥ कर कमलनि धनु सायकु फेरत । जिय की जरनि हरत हँसि हेरत ॥

श्रीरामजीके बलकल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [सीतारामजी ऐसे लगते हैं] मानो रति और कामदेवने मुनिका वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जीकी जलन हर लेते हैं (अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसीको परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है।) ॥ ४ ॥

दो०—लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु । ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु ॥ २३९ ॥

सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं ॥ २३९ ॥

सानुज सखा समेत मगन मन । बिसरे हरष सोक सुख दुख गन ॥ पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई । भूतल परे लकुट की नाई ॥

छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराजसमेत भरतजीका मन [प्रेममें] मग्न हो रहा है। हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये। 'हे नाथ ! रक्षा कीजिये, हे गुसाई ! रक्षा कीजिये' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर दण्डकी तरह गिर पड़े ॥ १ ॥

बचन सपेम लखन पहिचाने । करत प्रनामु भरत जियँ जाने ॥ बंधु सनेह सरस एहि ओरा । उत साहिब सेवा बस जोरा ॥

प्रेमभरे वचनोंसे लक्ष्मणजीने पहचान लिया और मनमें जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। [वे श्रीरामजीकी ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ-पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं।] अब इस ओर तो भाई भरतजीका सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजीकी सेवाकी प्रबल परवशता ॥ २ ॥

मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई । सुकबि लखन मन की गति भनई ॥ रहे राखि सेवा पर भास् । चढ़ी चंग जनु खैँच खेलास् ॥