श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
न तो [क्षणभरके लिये भी सेवासे पृथक् होकर] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश] छोड़ते (उपेक्षा करते) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजीके चित्तकी इस गति (दुविधा) का वर्णन कर सकता है। वे सेवापर भार रखकर रह गये (सेवाको ही विशेष महत्वपूर्ण समझकर उसीमें लगे रहे) मानो चढ़ी हुई पतंगको खिलाड़ी (पतंग उड़ानेवाला) खींच रहा हो ॥ ३ ॥
कहत सप्रेम नाइ महि माथा । भरत प्रनाम करत रघुनाथा ॥ उठे रामु सुनि पेम अधीरा । कहँ पट कहँ निषंग धनु तीरा ॥
लक्ष्मणजीने प्रेमसहित पृथ्वीपर मस्तक नवाकर कहा—हे रघुनाथजी ! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेममें अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण ॥ ४ ॥
दो०—बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान ।
भरत राम की मिलनि लिख बिसरे सबहि अपान ॥ २४० ॥
कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया। भरतजी और श्रीरामजीके मिलनेकी रीतिको देखकर सबको अपनी सुध भूल गयीं ॥ २४० ॥
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कबिकुल अगम करम मन बानी ॥ परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥
मिलनकी प्रीति कैसे बखानी जाय? वह तो कविकुलके लिये कर्म, मन, वाणी तीनोंसे अगम है। दोनों भाई (भरतजी और श्रीरामजी) मन, बुद्धि, चित और अहंकारको भुलाकर परम प्रेमसे पूर्ण हो रहे हैं ॥ १ ॥
कहहु सुपेम प्रगट को करई । केहि छाया कबि मति अनुसरई ॥ कबिहि अरथ आखर बलु साँचा । अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा ॥
कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेमको कौन प्रकट करे? कविकी बुद्धि किसकी छायाका अनुसरण करे? कविको तो अक्षर और अर्थका ही सच्चा बल है। नट तालकी गतिके अनुसार ही नाचता है! ॥ २ ॥
अगम सनेह भरत रघुबर को । जहाँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को ॥ सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती । बाज सुराग कि गाँडर ताँती ॥
भरतजी और श्रीरघुनाथजीका प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेमको मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडरकी ताँतसे भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है? ॥ ३ ॥
[तालाबों और झीलोंमें एक तरहकी घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं।]
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की । सुरगन सभय धकधकी धरकी ॥ समुझ्नाए सुरगुरु जड़ जागे । बरषि प्रसून प्रसंसन लागे ॥