श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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गुरुजीकी आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्याको लौट चलेंगे। परन्तु मुनि वसिष्ठजी तो श्रीरामचन्द्रजीकी रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे (अर्थात् वे श्रीरामजीकी रुचि देखे बिना जानेको नहीं कहेंगे)। माता कौसल्याजीके कहनेसे भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजीको जन्म देनेवाली माता क्या कभी हठ करेगी? ॥ २ ॥
मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महाँ कुसमउ बाम बिधाता ॥ जौँ हठ करउँ त निपट कुकरम् । हरगिरि तें गुरु सेवक धरम् ॥
मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है (मेरे दिन अच्छे नहीं हैं) और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म (अधर्म) होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी (निबाहनेमें कठिन) है ॥ ३ ॥
एकउ जुगुति न मन ठहरानी । सोचत भरतहि रैन बिहानी ॥ प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई । बैठत पठए रिषयँ बोलाई ॥
एक भी युक्ति भरतजीके मनमें न ठहरी। सोचते—ही—सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजीने उनको बुलवा भेजा ॥ ४ ॥
दो०—गुरु पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ॥ २५३ ॥
भरतजी गुरुके चरणकमलोंमें प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये ॥ २५३ ॥
बोले मुनिबरु समय समाना । सुनुहु सभासद भरत सुजाना ॥ धरम धुरीन भानुकुल भानू । राजा रामु स्वबस भगवान् ॥
श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले—हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुलके सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं ॥ १ ॥
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू । राम जनमु जग मंगल हेतू ॥ गुर पितु मातु बचन अनुसारि । खल दलु दलन देव हितकारी ॥
वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं। श्रीरामजीका अवतार ही जगत्के कल्याणके लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माताके वचनोंके अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टोंके दलका नाश करनेवाले और देवताओंके हितकारी हैं ॥ २ ॥
नीति प्रीति परमारथ स्वार्थु । कोउ न राम सम जान जथारथु ॥
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥