भारतकोश
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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

५५५

गुरुजीकी आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्याको लौट चलेंगे। परन्तु मुनि वसिष्ठजी तो श्रीरामचन्द्रजीकी रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे (अर्थात् वे श्रीरामजीकी रुचि देखे बिना जानेको नहीं कहेंगे)। माता कौसल्याजीके कहनेसे भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजीको जन्म देनेवाली माता क्या कभी हठ करेगी? ॥ २ ॥

मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महाँ कुसमउ बाम बिधाता ॥ जौँ हठ करउँ त निपट कुकरम् । हरगिरि तें गुरु सेवक धरम् ॥

मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है (मेरे दिन अच्छे नहीं हैं) और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म (अधर्म) होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी (निबाहनेमें कठिन) है ॥ ३ ॥

एकउ जुगुति न मन ठहरानी । सोचत भरतहि रैन बिहानी ॥ प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई । बैठत पठए रिषयँ बोलाई ॥

एक भी युक्ति भरतजीके मनमें न ठहरी। सोचते—ही—सोचते रात बीत गयी। भरतजी प्रातःकाल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजीने उनको बुलवा भेजा ॥ ४ ॥

दो०—गुरु पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।

बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ॥ २५३ ॥

भरतजी गुरुके चरणकमलोंमें प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये ॥ २५३ ॥

बोले मुनिबरु समय समाना । सुनुहु सभासद भरत सुजाना ॥ धरम धुरीन भानुकुल भानू । राजा रामु स्वबस भगवान् ॥

श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले—हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुलके सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं ॥ १ ॥

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू । राम जनमु जग मंगल हेतू ॥ गुर पितु मातु बचन अनुसारि । खल दलु दलन देव हितकारी ॥

वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं। श्रीरामजीका अवतार ही जगत्के कल्याणके लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माताके वचनोंके अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टोंके दलका नाश करनेवाले और देवताओंके हितकारी हैं ॥ २ ॥

नीति प्रीति परमारथ स्वार्थु । कोउ न राम सम जान जथारथु ॥

बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥

५५६

  • रामचरितमानस *

नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थको श्रीरामजीके समान यथार्थ (तत्त्वसे) कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल ॥ ३ ॥

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई । जोग सिद्धि निगमागम गाई ॥ करि बिचार जियँ देखहु नीकें । राम रजाइ सीस सबही कें ॥

शेषजी और [पृथ्वी एवं पातालके अन्यान्य] राजा आदि जहाँतक प्रभुता है, और योगकी सिद्धियाँ, जो वेद और शास्त्रोंमें गायी गयी हैं, हृदयमें अच्छी तरह विचार कर देखो, [तो यह स्पष्ट दिखायी देगा कि] श्रीरामजीकी आज्ञा इन सभीके सिरपर है (अर्थात् श्रीरामजी ही सबके एकमात्र महान् महेश्वर हैं) ॥ ४ ॥

दो०—राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ ।

समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ ॥ २५४ ॥

अतएव श्रीरामजीकी आज्ञा और रुख रखनेमें ही हम सबका हित होगा। [इस तत्व और रहस्यको समझकर] अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो ॥ २५४ ॥

सब कहँ सुखद राम अभिषेकू । मंगल मोद मूल मग एकू ॥ केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ । कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ ॥

श्रीरामजीका राज्याभिषेक सबके लिये सुखदायक है। मङ्गल और आनन्दका मूल यही एक मार्ग है। [अब] श्रीरघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाय ॥ १ ॥

सब सादर सुनि मुनिबर बानी । नय परमारथ स्वारथ सानी ॥ उतरु न आव लोग भए भोरे । तब सिरु नाइ भरत कर जोरे ॥

मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीकी नीति, परमार्थ और स्वार्थ (लौकिक हित) में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी। पर किसीको कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले (विचारशक्तिसे रहित) हो गये। तब भरतने सिर नवाकर हाथ जोड़े ॥ २ ॥

भानुबंस भए भूप घनैरे । अधिक एक तें एक बड़ेरे ॥ जनम हेतु सब कहँ पितु माता । करम सुभासुभ देइ बिधाता ॥

[और कहा—] सूर्यवंशमें एक-से-एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं। सभीके जन्मके कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मोंको (कर्मोंका फल) विधाता देते हैं ॥ ३ ॥

दलि दुख सजइ सकल कल्याना । अस असीस राउरि जगु जाना ॥ सो गोसाईं बिधि गति जेहिं छेंकी । सकइ को टारि टेक जो टेकी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५५७

आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दुःखोंका दमन करके, समस्त कल्याणोंको सज देती है; यह जगत् जानता है। हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाताकी गति (विधान) को भी रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी (जो निश्चय कर दिया) उसे कौन टाल सकता है? ॥ ४ ॥

दो०—बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।

सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु ॥ २५५ ॥

अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजीके प्रेममय वचनोंको सुनकर गुरुजीके हृदयमें प्रेम उमड़ आया ॥ २५५ ॥

तात बात फुरि राम कृपाहीं । राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ॥ सकुचउँ तात कहत एक बाता । अरध तजहिं बुध सरबस जाता ॥

[वे बोले—] हे तात! बात सत्य है, पर है रामजीकी कृपासे ही। रामविमुखको तो स्वप्नमें भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात! मैं एक बात कहनेमें सकुचाता हूँ। बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [आधेकी रक्षाके लिये] आधा छोड़ दिया करते हैं ॥ १ ॥

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई । फेरिअहिं लखन सीय रघुराई ॥ सुनि सुबचन हरषे दोउ भाता । भे प्रमोद परिपूरन गाता ॥

अतः तुम दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वनको जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्रीरामचन्द्रको लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये। उनके सारे अंग परमानन्दसे परिपूर्ण हो गये ॥ २ ॥

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा । जनु जिय राउ रामु भए राजा ॥ बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी । सम दुख सुख सब रोवहिं रानी ॥

उनके मन प्रसन्न हो गये। शरीरमें तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों! अन्य लोगोंको तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई। परन्तु रानियोंको दुःख-सुख समान ही थे (राम-लक्ष्मण वनमें रहें या भरत-शत्रुघ्न, दो पुत्रोंका वियोग तो रहेगा ही), यह समझकर वे सब रोने लगीं ॥ ३ ॥

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे । फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे ॥ कानन करउँ जनम भरि बासू । एहि तें अधिक न मोर सुपासू ॥

भरतजी कहने लगे—मुनिने जो कहा, वह करनेसे जगत्भरके जीवोंको उनकी इच्छित वस्तु देनेका फल होगा। [चौदह वर्षकी कोई अवधि नहीं,] मैं जन्मभर वनमें वास करूँगा। मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है ॥ ४ ॥

५५८

  • रामचरितमानस *

दो०—अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।

जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥ २५६॥

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी हृदयकी जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनोंको प्रमाण कीजिये (उनके अनुसार व्यवस्था कीजिये) ॥ २५६॥

भरत बचन सुनि देखि सनेहू । सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥

भरत महा महिमा जलरासी । मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥

भरतजीके वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गये (किसीको अपने देहकी सुधि न रही)। भरतजीकी महान् महिमा समुद्र है, मुनिकी बुद्धि उसके तटपर अबला स्त्रीके समान खड़ी है ॥ १ ॥

गा चह पार जतनु हियँ हेरा । पावति नाव न बोहितु बेरा॥

और करिहि को भरत बड़ाई । सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥

वह [उस समुद्रके] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदयमें उपाय भी ढूँढ़े! पर [उसे पार करनेका साधन] नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजीकी बड़ाई और कौन करेगा? तलैयाकी सीपीमें भी कहीं समुद्र समा सकता है? ॥ २ ॥

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए । सहित समाज राम पहिं आए॥

प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु । बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥

मुनि वसिष्ठजीके अन्तरात्माको भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजीके पास आये। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने प्रणामकर उत्तम आसन दिया। सब लोग मुनिकी आज्ञा सुनकर बैठ गये ॥ ३ ॥

बोले मुनिबरु बचन बिचारी । देस काल अवसर अनुहारी॥

सुनहु राम सरबग्य सुजाना । धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥

श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसरके अनुसार विचार करके वचन बोले—हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञानके भण्डार राम! सुनिये— ॥ ४ ॥

दो०—सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।

पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥ २५७॥

आप सबके हृदयके भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भावको जानते हैं। जिसमें पुरवासियोंका, माताओंका और भरतका हित हो, वही उपाय बतलाइये ॥ २५७॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५५९

आरत कहहिं बिचारि न काऊ । सूझ जुआरिहि आपन दाऊ ॥ सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ । नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ॥

आर्त (दुखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है। मुनिके बचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है ॥ १ ॥

सब कर हित रुख राउरि राखें । आयसु किऐं मुदित फुर भाखें ॥ प्रथम जो आयसु मो कहैं होई । माथें मनि करौं सिख सोई ॥

आपका रुख रखनेमें और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करनेमें ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माथेपर चढ़ाकर करूँ ॥ २ ॥

पुनि जेहि कहैं जस कहब गोसाई । सो सब भाँति घटिहि सेवकाई ॥ कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा । भरत सनेहैं बिचारु न राखा ॥

फिर हे गोसाई! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरहसे सेवामें लग जायगा (आज्ञापालन करेगा)। मुनि वसिष्ठजी कहने लगे—हे राम! तुमने सच कहा। पर भरतके प्रेमने विचारको नहीं रहने दिया ॥ ३ ॥

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी । भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥ मोरें जान भरत रुचि राखी । जो कीजिअ सो सुभ सिव सारखी ॥

इसीलिये मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्तिके वश हो गयी है। मेरी समझमें तो भरतकी रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा ॥ ४ ॥

दो०—भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।

करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि ॥ २५८ ॥

पहले भरतकी विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदोंका निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही (उसीके अनुसार) कीजिये ॥ २५८ ॥

गुर अनुरागु भरत पर देखी । राम हृदयें आनंदु बिसेषी ॥ भरतहि धरम धुरंधर जानी । निज सेवक तन मानस बानी ॥

भरतजीपर गुरुजीका स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें विशेष आनन्द हुआ। भरतजीको धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचनसे अपना सेवक जानकर— ॥ १ ॥

बोले गुर आयस अनुकूला । बचन मंजु मृदु मंगलमूला ॥ नाथ सपथ पितु चरन दोहाई । भयउ न भुअन भरत सम भाई ॥

५६०

  • रामचरितमानस *

श्रीरामचन्द्रजी गुरुकी आज्ञाके अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याणके मूल वचन बोले—हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजीके चरणोंकी दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ कि) विश्वभरमें भरतके समान भाई कोई हुआ ही नहीं ॥ २ ॥

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥ राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकड़ भरत कर भागू ॥

जो लोग गुरुके चरणकमलोंके अनुरागी हैं, वे लोकमें (लौकिक दृष्टिसे) भी और वेदमें (पारमार्थिक दृष्टिसे) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिसपर आप (गुरु) का ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको कौन कह सकता है ? ॥ ३ ॥

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई ॥ भरतु कहहिँ सोड़ किऐँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई ॥

छोटा भाई जानकर भरतके मुँहपर उसकी बड़ाई करनेमें मेरी बुद्धि सकुचाती है। (फिर भी मैं तो यही कहूँगा कि) भरत जो कुछ कहें, वही करनेमें भलाई है। ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे ॥ ४ ॥

दो०—तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।

कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात ॥ २५९ ॥

तब मुनि भरतजीसे बोले—हे तात! सब सङ्कोच त्यागकर कृपाके समुद्र अपने प्यारे भाईसे अपने हृदयकी बात कहो ॥ २५९ ॥

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई ॥ लखि अपनें सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिँ कछु करहिँ बिचारू ॥

मुनिके वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर—गुरु तथा स्वामीको भरपेट अपने अनुकूल जानकर—सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे ॥ १ ॥

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े ॥ कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौँ मैं काहा ॥

शरीरसे पुलकित होकर वे सभामें खड़े हो गये। कमलके समान नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंकी बाढ़ आ गयी। [वे बोले—] मेरा कहना तो मुनिनाथने ही निबाह दिया (जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया)। इससे अधिक मैं क्या कहूँ ? ॥ २ ॥

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ ॥ मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५६१

अपने स्वामीका स्वभाव में जानता हूँ। वे अपराधीपर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेलमें भी कभी उनकी रिस (अप्रसन्नता) नहीं देखी ॥ ३ ॥

सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू । कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ॥ मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही । हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥

बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मनको कभी नहीं तोड़ा (मेरे मनके प्रतिकूल कोई काम नहीं किया)। मैंने प्रभुकी कृपाकी रीतिको हृदयमें भलीभाँति देखा (अनुभव किया है)। मेरे हारनेपर भी खेलमें प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०—महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन ।

दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ॥ २६० ॥

मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला। प्रेमके प्यासे मेरे नेत्र आजतक प्रभुके दर्शनसे तृप्त नहीं हुए ॥ २६० ॥

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा । नीच बीचु जननी मिस पारा ॥ यहउ कहत मोहि आजु न सोभा । अपनी समुझि साधु सुचि को भा ॥

परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माताके बहाने [मेरे और स्वामीके बीच] अन्तर डाल दिया। यह भी कहना आज मुझे शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझसे कौन साधु और पवित्र हुआ है? (जिसको दूसरे साधु और पवित्र मानें, वही साधु है) ॥ १ ॥

मातु मंदि मैं साधु सुचाली । उर अस आनत कोटि कुचाली ॥ फरइ कि कोदव बालि सुसाली । मुकता प्रसव कि संबुक काली ॥

माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूँ, ऐसा हृदयमें लाना ही करोड़ दुराचारोंके समान है। क्या कोदोंकी बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है? ॥ २ ॥

सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू । मोर अभाग उदधि अवगाहू ॥ बिनु समुझें निज अघ परिपाकू । जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ॥

स्वप्नमें भी किसीको दोषका लेश भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। मैंने अपने पापोंका परिणाम समझे बिना ही माताको कटु वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया ॥ ३ ॥

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा । एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ॥ गुर गोसाईं साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥

५६२

  • रामचरितमानस *

मैं अपने हृदयमें सब ओर खोजकर हार गया (मेरी भलाईका कोई साधन नहीं सूझता)। एक ही प्रकार भले ही (निश्चय ही) मेरा भला है। वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं। इसीसे परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है ॥ ४ ॥

दो०—साधु सभों गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सतिभाउ।

प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ ॥ २६१ ॥

साधुओंकी सभामें गुरुजी और स्वामीके समीप इस पवित्र तीर्थ-स्थानमें मैं सत्य भावसे कहता हूँ। यह प्रेम है या प्रपञ्च (छल-कपट)? झूठ है या सच? इसे [सर्वज्ञ] मुनि वसिष्ठजी और [अन्तर्यामी] श्रीरघुनाथजी जानते हैं ॥ २६१ ॥

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु सारखी ॥ देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं ॥

प्रेमके प्रणको निबाहकर महाराज (पिताजी) का मरना और माताकी कुबुद्धि, दोनोंका सारा संसार साक्षी है। माताएँ व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं। अवधपुरीके नर-नारी दुःसह तापसे जल रहे हैं ॥ १ ॥

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला ॥ सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा ॥ बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ ॥ बहरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू ॥

मैं ही इन सारे अनर्थोंका मूल हूँ, यह सुन और समझकर मैंने सब दुःख सहा है। श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ मुनियोंका-सा वेष धारणकर बिना जूते पहने पाँव-प्यादे (पैदल) ही वनको चले गये, यह सुनकर, शङ्करजी साक्षी हैं, इस घावसे भी मैं जीता रह गया (यह सुनते ही मेरे प्राण नहीं निकल गये) ! फिर निषादराजका प्रेम देखकर भी इस वज्रसे भी कठोर हृदयमें छेद नहीं हुआ (यह फटा नहीं) ॥ २-३ ॥

अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबड़ सहाई ॥ जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी ॥

अब यहाँ आकर सब आँखों देख लिया। यह जड़ जीव जीता रहकर सभी सहावेगा। जिनको देखकर रास्तेकी साँपिनी और बीछी भी अपने भयानक विष और तीव्र क्रोधको त्याग देती हैं ॥ ४ ॥

दो०—तेड़ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।

तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावड़ काहि ॥ २६२ ॥

वे ही श्रीरघुनन्दन, लक्ष्मण और सीता जिसको शत्रु जान पड़े, उस कैकेयीके पुत्र मुझको छोड़कर दैव दुःसह दुःख और किसे सहावेगा? ॥ २६२ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५६३

सुनि अति बिकल भरत बर बानी । आरति प्रीति विनय नय सानी ॥ सोक मगन सब सभों खभारू । मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू ॥

अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीतिमें सनी हुई भरतजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोकमें मग्न हो गये, सारी सभामें विषाद छा गया। मानो कमलके वनपर पाला पड़ गया हो ॥ १ ॥

कहि अनेक बिधि कथा पुरानी । भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी ॥ बोले उचित बचन रघुनंदू । दिनकर कुल कैरव बन चंदू ॥

तब ज्ञानी मुनि वसिष्ठजीने अनेक प्रकारकी पुरानी (ऐतिहासिक) कथाएँ कहकर भरतजीका समाधान किया। फिर सूर्यकुलरूपी कुमुदवनके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले— ॥ २ ॥

तात जायँ जियँ करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥ तीनि काल तिभुअन मत मोरें । पुन्यसिलोक तात तर तोरें ॥

हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीवकी गतिको ईश्वरके अधीन जानो। मेरे मतमें [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों और [स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं ॥ ३ ॥

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोकु परलोकु नसाई ॥ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई । जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ॥

हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक (यहाँके सुख, यश आदि) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है (मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती)। माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है ॥ ४ ॥

दो०—मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार ।

लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार ॥ २६३ ॥

हे भरत! तुम्हारा नाम-स्मरण करते ही सब पाप, प्रपञ्च (अज्ञान) और समस्त अमङ्गलोंके समूह मिट जायेंगे तथा इस लोकमें सुन्दर यश और परलोकमें सुख प्राप्त होगा ॥ २६३ ॥

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी । भरत भूमि रह राउरि राखी ॥ तात कुतरक करहु जनि जाएँ । बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ ॥

हे भरत! मैं स्वभावसे ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है। हे तात! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। बैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते ॥ १ ॥

५६४

  • रामचरितमानस *

मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥ हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥

पक्षी और पशु मुनियोंके पास [बेधङ्क] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकाँको देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है ॥ २ ॥

तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें । करौं काह असमंजस जीकें ॥ राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी । तनु परिहरेउ पेम पन लागी ॥

हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ! क्या करूँ? जीमें बड़ा असमञ्जस (दुविधा) है। राजाने मुझे त्यागकर सत्यको रखा और प्रेम-प्रणके लिये शरीर छोड़ दिया ॥ ३ ॥

तासु बचन मेटत मन सोचू । तेहि तें अधिक तुम्हार संकोचू ॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा । अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥

उनके वचनको मेटते मनमें सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर भी गुरुजीने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

दो०—मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु ।

सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ॥ २६४ ॥

तुम मनको प्रसन्न कर और संकोचको त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया ॥ २६४ ॥

सुर गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिं चाहत होन अकाजू ॥ बनत उपाउ करत कछु नाहीं । राम सरन सब गे मन माहीं ॥

देवगणोंसहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन-ही-मन श्रीरामजीकी शरण गये ॥ १ ॥

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं । रघुपति भगत भगति बस अहहीं ॥ सुधि करि अंबरीष दुरबासा । भे सुर सुरपति निपट निरासा ॥

फिर वे विचार करके आपसमें कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासाकी [घटना] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये ॥ २ ॥

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा । नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ॥ लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा । अब सुर काज भरत के हाथा ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५६५

पहले देवताओंने बहुत समयतक दुःख सहे। तब भक्त प्रह्लादने ही नृसिंहभगवान्को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानोंसे लग-लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब (इस बार) देवताओंका काम भरतजीके हाथ है ॥ ३ ॥

आन उपाउ न देखिअ देवा । मानत रामु सुसेवक सेवा ॥ हिर्यं सपेम सुमिरहु सब भरतहि । निज गुन सील राम बस करतहि ॥

हे देवताओ! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता। श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकोंकी सेवाको मानते हैं (अर्थात् उनके भक्तकी कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं)। अतएव अपने गुण और शीलसे श्रीरामजीको वशमें करनेवाले भरतजीका ही सब लोग अपने-अपने हृदयमें प्रेमसहित स्मरण करो ॥ ४ ॥

दो०—सुनि सुरमत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु । सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ॥ २६५ ॥

देवताओंका मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं। भरतजीके चरणोंका प्रेम जगत्में समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है ॥ २६५ ॥

सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय सरिस सुहाई ॥ भरत भगति तुम्हरे मन आई । तजहु सोचु बिधि बात बनाई ॥

सीतानाथ श्रीरामजीके सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान सुन्दर है। तुम्हारे मनमें भरतजीकी भक्ति आयी है, तो अब सोच छोड़ दो। विधাতाने बात बना दी ॥ १ ॥

देखु देवपति भरत प्रभाऊ । सहज सुभार्यं बिबस रघुराऊ ॥ मन थिर करहु देव डरु नाहीं । भरतहि जानि राम परिछाहीं ॥

हे देवराज! भरतजीका प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभावसे ही उनके पूर्णरूपसे वशमें हैं। हे देवताओ! भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीकी परछाई (परछाईकी भाँति उनका अनुसरण करनेवाला) जानकर मन स्थिर करो, डरकी बात नहीं है ॥ २ ॥

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू । अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ॥ निज सिर भारु भरत जियँ जाना । करत कोटि बिधि उर अनुमाना ॥

देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओंकी सम्मति (आपसका विचार) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजीको संकोच हुआ। भरतजीने अपने मनमें सब बौद्धा अपने ही सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों (अनेकों) प्रकारके अनुमान (विचार) करने लगे ॥ ३ ॥

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका । राम रजायस आपन नीका ॥ निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥

५६६

  • रामचरितमानस *

सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजीकी आज्ञामें ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया (अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया) ॥ ४ ॥

दो०—कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।

करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ॥ २६६ ॥

श्रीजानकीनाथजीने सब प्रकारसे मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों कर-कमलोंको जोड़कर प्रणाम करके बोले— ॥ २६६ ॥

कहाँ कहावों का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥

गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कल्पित सूला ॥

हे स्वामी! हे कृपाके समुद्र! हे अन्तर््यामी! अब मैं [अधिक] क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? गुरु महाराजको प्रसन्न और स्वामीको अनुकूल जानकर मेरे मलिन मनकी कल्पित पीड़ा मिट गयी ॥ १ ॥

अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें ॥

मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई ॥

मैं मिथ्या डरसे ही डर गया था। मेरे सोचकी जड़ ही न थी। दिशा भूल जानेपर हे देव! सूर्यका दोष नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, माताकी कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और कालकी कठिनता, ॥ २ ॥

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला ॥

यह नड़ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ॥

इन सबने मिलकर पैर रोपकर (प्रण करके) मुझे नष्ट कर दिया था। परन्तु शरणागतके रक्षक आपने अपना [शरणागतकी रक्षाका] प्रण निबाहा (मुझे बचा लिया)। यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है। यह लोक और वेदोंमें प्रकट है, छिपी नहीं है ॥ ३ ॥

जगु अनभल भल एकु गोसाई। कहिअ होइ भल कासु भलाई ॥

देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ॥

सारा जगत् बुरा [करनेवाला] हो; किन्तु हे स्वामी! केवल एक आप ही भले (अनुकूल) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाईसे भला हो सकता है? हे देव! आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है; वह न कभी किसीके सम्मुख (अनुकूल) है, न विमुख (प्रतिकूल) ॥ ४ ॥

दो०—जाड़ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।

मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच ॥ २६७ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५६७

उस वृक्ष (कल्पवृक्ष) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिन्ताओंका नाश करनेवाली है। राजा-रंक, भले-बुरे, जगत्में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं ॥ २६७ ॥

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ॥ अब करुनाकर कीजिअ सोई । जन हित प्रभु चित छोभु न होई ॥

गुरु और स्वामीका सब प्रकारसे स्नेह देखकर मेरा शोभ मिट गया, मनमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा। हे दयाकी खान! अब वही कीजिये जिससे दासके लिये प्रभुके चितमें शोभ (किसी प्रकारका विचार) न हो ॥ १ ॥

जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥ सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥

जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे ॥ २ ॥

स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किऐँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥ यह स्वारथ परमारथ सारु । सकल सुकृत फल सुगति सिंगाारु ॥

हे नाथ! आपके लौटनेमें सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करनेमें करोड़ों प्रकारसे कल्याण है। यही स्वार्थ और परमार्थका सार (निचोड़) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका श्रृङ्गार है ॥ ३ ॥

देव एक बिनती सुनि मोरी । उचित होइ तस करब बहोरी ॥ तिलक समाजु साजि सबु आना । करिअ सुफल प्रभु जौँ मनु माना ॥

हे देव! आप मेरी एक बिनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये। राजतिलककी सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, जो प्रभुका मन माने तो उसे सफल कीजिये (उसका उपयोग कीजिये) ॥ ४ ॥

दो०—सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ ।

नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौँ मैं साथ ॥ २६८ ॥

छोटे भाई शत्रुघ्नसमेत मुझे बनमें भेज दीजिये और [अयोध्या लौटकर] सबको सनाथ कीजिये। नहीं तो किसी तरह भी (यदि आप अयोध्या जानेको तैयार न हों) हे नाथ! लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिये और मैं आपके साथ चलूँ ॥ २६८ ॥

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई । बहुरिअ सीय सहित रघुराई ॥ जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई । करुना सागर कीजिअ सोई ॥

५६८

  • रामचरितमानस *

अथवा हम तीनों भाई बन चले जायें और हे श्रीरघुनाथजी! आप श्रीसीताजीसहित [अयोध्याको] लौट जाइये। हे दयासागर! जिस प्रकारसे प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिये ॥ १ ॥

देवें दीन्ह सबु मोहि अभारू । मोरें नीति न धरम बिचारू ॥ कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत कें चित् चेतू ॥

हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका। मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त (दुखी) मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता ॥ २ ॥

उतरु देइ सुनि स्वामि रजार्ई । सो सेवकु लखि लाज लजार्ई ॥ अस मैं अवगुन उदधि अगाधू । स्वामि सनेहैं सराहत साधू ॥

स्वामीकी आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी (आप) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं ॥ ३ ॥

अब कृपाल मोहि सो मत भावा । सकुच स्वामि मन जाई न पावा ॥ प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ । जग मंगल हित एक उपाऊ ॥

हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामीका मन संकोच न पावे। प्रभुके चरणोंकी शपथ है, मैं सत्य भावसे कहता हूँ, जगत्के कल्याणके लिये एक यही उपाय है ॥ ४ ॥

दो०—प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब ।

सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ॥ २६९ ॥

प्रसन्न मनसे संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा-चढ़ाकर [पालन] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायँगी ॥ २६९ ॥

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥ असमंजस बस अवध नेवासी । प्रमुदित मन तापस बनबासी ॥

भरतजीके पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये। अयोध्यानिवासी असमंजसके वश हो गये [कि देखें अब श्रीरामजी क्या कहते हैं]। तपस्वी तथा वनवासी लोग [श्रीरामजीके वनमें बने रहनेकी आशासे] मनमें परम आनन्दित हुए ॥ १ ॥

चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची । प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥ जनक दूत तेहि अवसर आए । मुनि बसिष्ठ सुनि बेगि बोलाए ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५६१

किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये। प्रभुकी यह स्थिति (मौन) देख सारी सभा सोचमें पड़ गयी। उसी समय जनकजीके दूत आये, यह सुनकर मुनि वसिष्ठजीने उन्हें तुरंत बुलवा लिया ॥ २ ॥

करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे । बेषु देखि भए निपट दुखारे ॥ दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता । कहहु बिदेह भूप कुसलाता ॥

उन्होंने [आकर] प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीको देखा। उनका [मुनियोंका-सा] वेष देखकर वे बहुत ही दुखी हुए। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दूतोंसे बात पूछी कि राजा जनकका कुशल-समाचार कहो ॥ ३ ॥

सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा । बोले चरबर जोरें हाथा ॥ बूझब राउर सादर साई । कुसल हेतु सो भयउ गोसाई ॥

यह (मुनिका कुशलप्रश्न) सुनकर सकुचाकर पृथ्वीपर मस्तक नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले—हे स्वामी! आपका आदरके साथ पूछना, यही हे गोसाई! कुशलका कारण हो गया ॥ ४ ॥

दो०—नाहिं त कोसलनाथ कें साथ कुसल गइ नाथ । मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ ॥ २७० ॥

नहीं तो हे नाथ! कुशल-क्षेम तो सब कोसलनाथ दशरथजीके साथ ही चली गयी। [उनके चले जानेसे] यों तो सारा जगत् ही अनाथ (स्वामीके बिना असहाय) हो गया, किन्तु मिथिला और अवध तो विशेषरूपसे अनाथ हो गये ॥ २७० ॥

कोसलपति गति सुनि जनकौरा । भे सब लोक सोकबस बौरा ॥ जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू । नामु सत्य अस लाग न केहू ॥

अयोध्यानाथकी गति (दशरथजीका मरण) सुनकर जनकपुरवासी सभी लोग शोकवश बावले हो गये (सुध-बुध भूल गये)। उस समय जिन्होंने विदेहको [शोकमग्न] देखा, उनमेंसे किसीको ऐसा न लगा कि उनका विदेह (देहाभिमानरहित) नाम सत्य है! [क्योंकि देहाभिमानसे शून्य पुरुषको शोक कैसा ?] ॥ १ ॥

रानि कुचालि सुनत नरपालहि । सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ॥ भरत राज रघुबर बनबासू । भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू ॥

रानीकी कुचाल सुनकर राजा जनकजीको कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणिके बिना साँपको नहीं सूझता। फिर भरतजीको राज्य और श्रीरामचन्द्रजीको वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ ॥ २ ॥

५७०

  • रामचरितमानस *

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥ समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥

राजाने विद्वानों और मन्त्रियोंके समाजसे पूछा कि विचारकर कहिये, आज (इस समय) क्या करना उचित है? अयोध्याकी दशा समझकर और दोनों प्रकारसे असमंजस जानकर 'चलिये या रहिये?' किसीने कुछ नहीं कहा॥ ३ ॥

नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥ बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥

[जब किसीने कोई सम्मति नहीं दी] तब राजाने धीरज धर हृदयमें विचारकर चार चतुर गुप्तचर (जासूस) अयोध्याको भेजे [और उनसे कह दिया कि] तुमलोग [श्रीरामजीके प्रति] भरतजीके सद्भाव (अच्छे भाव, प्रेम) या दुर्भाव (बुरा भाव, विरोध) का [यथार्थ] पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसीको तुम्हारा पता न लगने पावे॥ ४ ॥

दो०—गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।

चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥ २७१॥

गुप्तचर अवधको गये और भरतजीका ढंग जानकर और उनकी करनी देखकर, जैसे ही भरतजी चित्रकूटको चले, वे तिरहुत (मिथिला) को चल दिये॥ २७१ ॥

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥ सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥

[गुप्त] दूतोंने आकर राजा जनकजीकी सभामें भरतजीकी करनीका अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुटुम्बी, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्नेहसे अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ १ ॥

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥ घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥

फिर जनकजीने धीरज धरकर और भरतजीकी बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया। घर, नगर और देशमें रक्षकोंको रखकर छोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत-सी सवारियाँ सजवारीं॥ २ ॥

दुधरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥ भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥

वे दुधड़िया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजाने रास्तेमें कहीं विश्राम भी नहीं किया। आज ही सबेरे प्रयागराजमें स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे, ॥ ३ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५७१

खबरि लेन हम पठए नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ॥ साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥

तब हे नाथ! हमें खबर लेनेको भेजा। उन्होंने (दूतोंने) ऐसा कहकर पृथ्वीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कोई छः-सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत बिदा कर दिया ॥ ४ ॥

दो०—सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।

रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥ २७२ ॥

जनकजीका आगमन सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो गया। श्रीरामजीको बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेषरूपसे सोचके वशमें हो गये ॥ २७२ ॥

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई ॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी ॥

कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे? और सब नर-नारी मनमें ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि [अच्छा हुआ, जनकजीके आनेसे] चार (कुछ) दिन और रहना हो गया ॥ १ ॥

एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ ॥ करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी ॥

इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रातःकाल सब कोई स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान्की पूजा करते हैं ॥ २ ॥

रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ॥ राजा रामु जानकी रानी। आनंद अवधि अवध रजधानी ॥

फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके चरणोंकी वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्दकी सीमा होकर— ॥ ३ ॥

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुं जुबराजा ॥ एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू ॥

फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजीको युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सब किसीको जगत्में जीनेका लाभ दीजिये ॥ ४ ॥

दो०—गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।

अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ॥ २७३ ॥

५७२

  • रामचरितमानस *

गुरु, समाज और भाइयोंसमेत श्रीरामजीका राज्य अवधपुरीमें हो और श्रीरामजीके राजा रहते ही हमलोग अयोध्यामें मरें। सब कोई यही माँगते हैं ॥ २७३ ॥

सुनि सनेहमय पुरजन बानी । निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी ॥ एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन । रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन ॥

अयोध्यावासियोंकी प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्यकी निन्दा करते हैं। अवधवासी इस प्रकार नित्यकर्म करके श्रीरामजीको पुलकितशरीर हो प्रणाम करते हैं ॥ १ ॥

ऊँच नीच मध्यम नर नारी । लहहिं दरसु निज निज अनुहारी ॥ सावधान सबही सनमानहिं । सकल सराहत कृपानिधानहिं ॥

ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियोंके स्त्री-पुरुष अपने-अपने भावके अनुसार श्रीरामजीका दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानीके साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी सराहना करते हैं ॥ २ ॥

लरिकाइहि तें रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥ सील सकोच सिंधु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥

श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समृद्ध हैं। वे सुन्दर मुखके [या सबके अनुकूल रहनेवाले], सुन्दर नेत्रवाले [या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले] और सरलस्वभाव हैं ॥ ३ ॥

कहत राम गुन गन अनुरागे । सब निज भाग सराहन लागे ॥ हम सम पुन्य पुंज जग थोरे । जिन्हहि रामु जानत करि मोरे ॥

श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते-कहते सब लोग प्रेममें भर गये और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे कि जगत्में हमारे समान पुण्यकी बड़ी पूँजीवाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं (ये मेरे हैं ऐसा जानते हैं) ॥ ४ ॥

दो०—प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु ।

सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु ॥ २७४ ॥

उस समय सब लोग प्रेममें मग्न हैं। इतनेमें ही मिथिलापति जनकजीको आते हुए सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी सभासहित आदरपूर्वक जल्दीसे उठ खड़े हुए ॥ २७४ ॥

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा । आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा ॥ गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं । करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५७३

भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियोंको साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे (जनकजीकी अगवानीमें) चले। जनकजीने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथको देखा, त्यों ही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया (पैदल चलना शुरू कर दिया) ॥ १ ॥

राम दरस लालसा उछाहूँ। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहूँ ॥ मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ॥

श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण किसीको रास्तेकी थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है। मन तो वहाँ है जहाँ श्रीराम और जानकीजी हैं। बिना मनके शरीरके सुख-दुःखकी सुध किसको हो ? ॥ २ ॥

आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती ॥ आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे ॥

जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं। समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है। निकट आये देखकर सब प्रेममें भर गये और आदरपूर्वक आपसमें मिलने लगे ॥ ३ ॥

लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ॥ भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि ॥

जनकजी [वसिष्ठ आदि अयोध्यावासी] मुनियोंके चरणोंकी वन्दना करने लगे और श्रीरामचन्द्रजीने [शतानन्द आदि जनकपुरवासी] ऋषियोंको प्रणाम किया। फिर भाइयोंसमेत श्रीरामजी राजा जनकजीसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रमको लिवा चले ॥ ४ ॥

दो०—आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।

सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥ २७५ ॥

श्रीरामजीका आश्रम शान्तरसरूपी पवित्र जलसे परिपूर्ण समुद्र है। जनकजीकी सेना (समाज) मानो करुणा (करुणरस) की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी शान्तरसके समुद्रमें मिलानेके लिये] लिये जा रहे हैं ॥ २७५ ॥

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे ॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥

यह करुणाकी नदी [इतनी बड़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें (आहें) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गें हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं ॥ १ ॥

बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ॥ केवट बुध बिद्या बडि नावा। सकहिं न खेड़ ऐक नहिं आवा ॥

५७४

  • रामचरितमानस *

भयानक विषाद (शोक) ही उस नदीकी तेज धारा है। भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं, (उस विद्याका उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसीको उसकी अटकल ही नहीं आती है ॥ २ ॥

बनचर कोल किरात बिचारे । थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ॥ आश्रम उदधि मिली जब जाई । मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई ॥

वनमें विचरनेवाले बेचारे कोल-किरात ही यात्री हैं, जो उस नदीको देखकर हृदयमें हारकर थक गये हैं। यह करुणा-नदी जब आश्रम-समुद्रमें जाकर मिली, तो मानो वह समुद्र अकुला उठा (खौल उठा) ॥ ३ ॥

सोक बिकल दोउ राज समाजा । रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा ॥ भूप रूप गुन सील सराही । रोवहिँ सोक सिंधु अवगाही ॥

दोनों राजसमाज शोकसे व्याकुल हो गये। किसीको न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही रही। राजा दशरथजीके रूप, गुण और शीलकी सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोकसमुद्रमें डुबकी लगा रहे हैं ॥ ४ ॥

छं०—अवगाहि सोक समुद्र सोचहिँ नारि नर व्याकुल महा । दै दोष सकल सरोष बोलहिँ बाम बिधि कीन्हो कहा ॥ सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की । तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की ॥

शोकसमुद्रमें डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच (चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाताको दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाताने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनिगणोंमें कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की दशा देखकर प्रेमकी नदीको पार कर सके (प्रेममें मग्न हुए बिना रह सके)।

सो०—किए अमित उपदेस जहाँ तहाँ लोगन्ह मुनिबरन्ह । धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन ॥ २७६ ॥

जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ मुनियोंने लोगोंको अपरिमित उपदेश दिये और बसिष्ठजीने विदेह (जनकजी) से कहा—हे राजन्! आप धैर्य धारण कीजिये ॥ २७६ ॥

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥ तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बड़ाई ॥