भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 563
  • अयोध्याकाण्ड *

५६१

अपने स्वामीका स्वभाव में जानता हूँ। वे अपराधीपर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेलमें भी कभी उनकी रिस (अप्रसन्नता) नहीं देखी ॥ ३ ॥

सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू । कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ॥ मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही । हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥

बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मनको कभी नहीं तोड़ा (मेरे मनके प्रतिकूल कोई काम नहीं किया)। मैंने प्रभुकी कृपाकी रीतिको हृदयमें भलीभाँति देखा (अनुभव किया है)। मेरे हारनेपर भी खेलमें प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं ॥ ४ ॥

दो०—महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन ।

दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ॥ २६० ॥

मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला। प्रेमके प्यासे मेरे नेत्र आजतक प्रभुके दर्शनसे तृप्त नहीं हुए ॥ २६० ॥

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा । नीच बीचु जननी मिस पारा ॥ यहउ कहत मोहि आजु न सोभा । अपनी समुझि साधु सुचि को भा ॥

परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माताके बहाने [मेरे और स्वामीके बीच] अन्तर डाल दिया। यह भी कहना आज मुझे शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझसे कौन साधु और पवित्र हुआ है? (जिसको दूसरे साधु और पवित्र मानें, वही साधु है) ॥ १ ॥

मातु मंदि मैं साधु सुचाली । उर अस आनत कोटि कुचाली ॥ फरइ कि कोदव बालि सुसाली । मुकता प्रसव कि संबुक काली ॥

माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूँ, ऐसा हृदयमें लाना ही करोड़ दुराचारोंके समान है। क्या कोदोंकी बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है? ॥ २ ॥

सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू । मोर अभाग उदधि अवगाहू ॥ बिनु समुझें निज अघ परिपाकू । जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ॥

स्वप्नमें भी किसीको दोषका लेश भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। मैंने अपने पापोंका परिणाम समझे बिना ही माताको कटु वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया ॥ ३ ॥

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा । एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ॥ गुर गोसाईं साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥