भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 562

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  • रामचरितमानस *

श्रीरामचन्द्रजी गुरुकी आज्ञाके अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याणके मूल वचन बोले—हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजीके चरणोंकी दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ कि) विश्वभरमें भरतके समान भाई कोई हुआ ही नहीं ॥ २ ॥

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥ राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकड़ भरत कर भागू ॥

जो लोग गुरुके चरणकमलोंके अनुरागी हैं, वे लोकमें (लौकिक दृष्टिसे) भी और वेदमें (पारमार्थिक दृष्टिसे) भी बड़भागी होते हैं! [फिर] जिसपर आप (गुरु) का ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको कौन कह सकता है ? ॥ ३ ॥

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई ॥ भरतु कहहिँ सोड़ किऐँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई ॥

छोटा भाई जानकर भरतके मुँहपर उसकी बड़ाई करनेमें मेरी बुद्धि सकुचाती है। (फिर भी मैं तो यही कहूँगा कि) भरत जो कुछ कहें, वही करनेमें भलाई है। ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे ॥ ४ ॥

दो०—तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।

कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात ॥ २५९ ॥

तब मुनि भरतजीसे बोले—हे तात! सब सङ्कोच त्यागकर कृपाके समुद्र अपने प्यारे भाईसे अपने हृदयकी बात कहो ॥ २५९ ॥

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई ॥ लखि अपनें सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिँ कछु करहिँ बिचारू ॥

मुनिके वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर—गुरु तथा स्वामीको भरपेट अपने अनुकूल जानकर—सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे ॥ १ ॥

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े ॥ कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौँ मैं काहा ॥

शरीरसे पुलकित होकर वे सभामें खड़े हो गये। कमलके समान नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंकी बाढ़ आ गयी। [वे बोले—] मेरा कहना तो मुनिनाथने ही निबाह दिया (जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया)। इससे अधिक मैं क्या कहूँ ? ॥ २ ॥

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ ॥ मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥