श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 561, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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आरत कहहिं बिचारि न काऊ । सूझ जुआरिहि आपन दाऊ ॥ सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ । नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ॥
आर्त (दुखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है। मुनिके बचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे—हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है ॥ १ ॥
सब कर हित रुख राउरि राखें । आयसु किऐं मुदित फुर भाखें ॥ प्रथम जो आयसु मो कहैं होई । माथें मनि करौं सिख सोई ॥
आपका रुख रखनेमें और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करनेमें ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माथेपर चढ़ाकर करूँ ॥ २ ॥
पुनि जेहि कहैं जस कहब गोसाई । सो सब भाँति घटिहि सेवकाई ॥ कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा । भरत सनेहैं बिचारु न राखा ॥
फिर हे गोसाई! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरहसे सेवामें लग जायगा (आज्ञापालन करेगा)। मुनि वसिष्ठजी कहने लगे—हे राम! तुमने सच कहा। पर भरतके प्रेमने विचारको नहीं रहने दिया ॥ ३ ॥
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी । भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥ मोरें जान भरत रुचि राखी । जो कीजिअ सो सुभ सिव सारखी ॥
इसीलिये मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्तिके वश हो गयी है। मेरी समझमें तो भरतकी रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा ॥ ४ ॥
दो०—भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि ॥ २५८ ॥
पहले भरतकी विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदोंका निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही (उसीके अनुसार) कीजिये ॥ २५८ ॥
गुर अनुरागु भरत पर देखी । राम हृदयें आनंदु बिसेषी ॥ भरतहि धरम धुरंधर जानी । निज सेवक तन मानस बानी ॥
भरतजीपर गुरुजीका स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें विशेष आनन्द हुआ। भरतजीको धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचनसे अपना सेवक जानकर— ॥ १ ॥
बोले गुर आयस अनुकूला । बचन मंजु मृदु मंगलमूला ॥ नाथ सपथ पितु चरन दोहाई । भयउ न भुअन भरत सम भाई ॥