भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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  • रामचरितमानस *

दो०—अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।

जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥ २५६॥

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी हृदयकी जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनोंको प्रमाण कीजिये (उनके अनुसार व्यवस्था कीजिये) ॥ २५६॥

भरत बचन सुनि देखि सनेहू । सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥

भरत महा महिमा जलरासी । मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥

भरतजीके वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गये (किसीको अपने देहकी सुधि न रही)। भरतजीकी महान् महिमा समुद्र है, मुनिकी बुद्धि उसके तटपर अबला स्त्रीके समान खड़ी है ॥ १ ॥

गा चह पार जतनु हियँ हेरा । पावति नाव न बोहितु बेरा॥

और करिहि को भरत बड़ाई । सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥

वह [उस समुद्रके] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदयमें उपाय भी ढूँढ़े! पर [उसे पार करनेका साधन] नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजीकी बड़ाई और कौन करेगा? तलैयाकी सीपीमें भी कहीं समुद्र समा सकता है? ॥ २ ॥

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए । सहित समाज राम पहिं आए॥

प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु । बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥

मुनि वसिष्ठजीके अन्तरात्माको भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजीके पास आये। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने प्रणामकर उत्तम आसन दिया। सब लोग मुनिकी आज्ञा सुनकर बैठ गये ॥ ३ ॥

बोले मुनिबरु बचन बिचारी । देस काल अवसर अनुहारी॥

सुनहु राम सरबग्य सुजाना । धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥

श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसरके अनुसार विचार करके वचन बोले—हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञानके भण्डार राम! सुनिये— ॥ ४ ॥

दो०—सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।

पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥ २५७॥

आप सबके हृदयके भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भावको जानते हैं। जिसमें पुरवासियोंका, माताओंका और भरतका हित हो, वही उपाय बतलाइये ॥ २५७॥