श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 567, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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पहले देवताओंने बहुत समयतक दुःख सहे। तब भक्त प्रह्लादने ही नृसिंहभगवान्को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानोंसे लग-लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब (इस बार) देवताओंका काम भरतजीके हाथ है ॥ ३ ॥
आन उपाउ न देखिअ देवा । मानत रामु सुसेवक सेवा ॥ हिर्यं सपेम सुमिरहु सब भरतहि । निज गुन सील राम बस करतहि ॥
हे देवताओ! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता। श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकोंकी सेवाको मानते हैं (अर्थात् उनके भक्तकी कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं)। अतएव अपने गुण और शीलसे श्रीरामजीको वशमें करनेवाले भरतजीका ही सब लोग अपने-अपने हृदयमें प्रेमसहित स्मरण करो ॥ ४ ॥
दो०—सुनि सुरमत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु । सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ॥ २६५ ॥
देवताओंका मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा—अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं। भरतजीके चरणोंका प्रेम जगत्में समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है ॥ २६५ ॥
सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय सरिस सुहाई ॥ भरत भगति तुम्हरे मन आई । तजहु सोचु बिधि बात बनाई ॥
सीतानाथ श्रीरामजीके सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान सुन्दर है। तुम्हारे मनमें भरतजीकी भक्ति आयी है, तो अब सोच छोड़ दो। विधাতाने बात बना दी ॥ १ ॥
देखु देवपति भरत प्रभाऊ । सहज सुभार्यं बिबस रघुराऊ ॥ मन थिर करहु देव डरु नाहीं । भरतहि जानि राम परिछाहीं ॥
हे देवराज! भरतजीका प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभावसे ही उनके पूर्णरूपसे वशमें हैं। हे देवताओ! भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीकी परछाई (परछाईकी भाँति उनका अनुसरण करनेवाला) जानकर मन स्थिर करो, डरकी बात नहीं है ॥ २ ॥
सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू । अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ॥ निज सिर भारु भरत जियँ जाना । करत कोटि बिधि उर अनुमाना ॥
देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओंकी सम्मति (आपसका विचार) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजीको संकोच हुआ। भरतजीने अपने मनमें सब बौद्धा अपने ही सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों (अनेकों) प्रकारके अनुमान (विचार) करने लगे ॥ ३ ॥
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका । राम रजायस आपन नीका ॥ निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥