भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 566

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  • रामचरितमानस *

मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥ हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥

पक्षी और पशु मुनियोंके पास [बेधङ्क] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकाँको देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रुको पशु-पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है ॥ २ ॥

तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें । करौं काह असमंजस जीकें ॥ राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी । तनु परिहरेउ पेम पन लागी ॥

हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ! क्या करूँ? जीमें बड़ा असमञ्जस (दुविधा) है। राजाने मुझे त्यागकर सत्यको रखा और प्रेम-प्रणके लिये शरीर छोड़ दिया ॥ ३ ॥

तासु बचन मेटत मन सोचू । तेहि तें अधिक तुम्हार संकोचू ॥ ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा । अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥

उनके वचनको मेटते मनमें सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर भी गुरुजीने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

दो०—मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु ।

सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ॥ २६४ ॥

तुम मनको प्रसन्न कर और संकोचको त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ। सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया ॥ २६४ ॥

सुर गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिं चाहत होन अकाजू ॥ बनत उपाउ करत कछु नाहीं । राम सरन सब गे मन माहीं ॥

देवगणोंसहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना-बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन-ही-मन श्रीरामजीकी शरण गये ॥ १ ॥

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं । रघुपति भगत भगति बस अहहीं ॥ सुधि करि अंबरीष दुरबासा । भे सुर सुरपति निपट निरासा ॥

फिर वे विचार करके आपसमें कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्तकी भक्तिके वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासाकी [घटना] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये ॥ २ ॥

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा । नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ॥ लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा । अब सुर काज भरत के हाथा ॥