श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 570, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
अथवा हम तीनों भाई बन चले जायें और हे श्रीरघुनाथजी! आप श्रीसीताजीसहित [अयोध्याको] लौट जाइये। हे दयासागर! जिस प्रकारसे प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिये ॥ १ ॥
देवें दीन्ह सबु मोहि अभारू । मोरें नीति न धरम बिचारू ॥ कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत कें चित् चेतू ॥
हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका। मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ। आर्त (दुखी) मनुष्यके चित्तमें चेत (विवेक) नहीं रहता ॥ २ ॥
उतरु देइ सुनि स्वामि रजार्ई । सो सेवकु लखि लाज लजार्ई ॥ अस मैं अवगुन उदधि अगाधू । स्वामि सनेहैं सराहत साधू ॥
स्वामीकी आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह समुद्र हूँ [कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ]। किन्तु स्वामी (आप) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं ॥ ३ ॥
अब कृपाल मोहि सो मत भावा । सकुच स्वामि मन जाई न पावा ॥ प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ । जग मंगल हित एक उपाऊ ॥
हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामीका मन संकोच न पावे। प्रभुके चरणोंकी शपथ है, मैं सत्य भावसे कहता हूँ, जगत्के कल्याणके लिये एक यही उपाय है ॥ ४ ॥
दो०—प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब ।
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ॥ २६९ ॥
प्रसन्न मनसे संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा-चढ़ाकर [पालन] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायँगी ॥ २६९ ॥
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥ असमंजस बस अवध नेवासी । प्रमुदित मन तापस बनबासी ॥
भरतजीके पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और 'साधु-साधु' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये। अयोध्यानिवासी असमंजसके वश हो गये [कि देखें अब श्रीरामजी क्या कहते हैं]। तपस्वी तथा वनवासी लोग [श्रीरामजीके वनमें बने रहनेकी आशासे] मनमें परम आनन्दित हुए ॥ १ ॥
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची । प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥ जनक दूत तेहि अवसर आए । मुनि बसिष्ठ सुनि बेगि बोलाए ॥