भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 569
  • अयोध्याकाण्ड *

५६७

उस वृक्ष (कल्पवृक्ष) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिन्ताओंका नाश करनेवाली है। राजा-रंक, भले-बुरे, जगत्में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं ॥ २६७ ॥

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ॥ अब करुनाकर कीजिअ सोई । जन हित प्रभु चित छोभु न होई ॥

गुरु और स्वामीका सब प्रकारसे स्नेह देखकर मेरा शोभ मिट गया, मनमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा। हे दयाकी खान! अब वही कीजिये जिससे दासके लिये प्रभुके चितमें शोभ (किसी प्रकारका विचार) न हो ॥ १ ॥

जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥ सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥

जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे ॥ २ ॥

स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किऐँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥ यह स्वारथ परमारथ सारु । सकल सुकृत फल सुगति सिंगाारु ॥

हे नाथ! आपके लौटनेमें सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करनेमें करोड़ों प्रकारसे कल्याण है। यही स्वार्थ और परमार्थका सार (निचोड़) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका श्रृङ्गार है ॥ ३ ॥

देव एक बिनती सुनि मोरी । उचित होइ तस करब बहोरी ॥ तिलक समाजु साजि सबु आना । करिअ सुफल प्रभु जौँ मनु माना ॥

हे देव! आप मेरी एक बिनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये। राजतिलककी सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, जो प्रभुका मन माने तो उसे सफल कीजिये (उसका उपयोग कीजिये) ॥ ४ ॥

दो०—सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ ।

नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौँ मैं साथ ॥ २६८ ॥

छोटे भाई शत्रुघ्नसमेत मुझे बनमें भेज दीजिये और [अयोध्या लौटकर] सबको सनाथ कीजिये। नहीं तो किसी तरह भी (यदि आप अयोध्या जानेको तैयार न हों) हे नाथ! लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिये और मैं आपके साथ चलूँ ॥ २६८ ॥

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई । बहुरिअ सीय सहित रघुराई ॥ जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई । करुना सागर कीजिअ सोई ॥