श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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खबरि लेन हम पठए नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ॥ साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥
तब हे नाथ! हमें खबर लेनेको भेजा। उन्होंने (दूतोंने) ऐसा कहकर पृथ्वीपर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कोई छः-सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत बिदा कर दिया ॥ ४ ॥
दो०—सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥ २७२ ॥
जनकजीका आगमन सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो गया। श्रीरामजीको बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेषरूपसे सोचके वशमें हो गये ॥ २७२ ॥
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई ॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी ॥
कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे? और सब नर-नारी मनमें ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि [अच्छा हुआ, जनकजीके आनेसे] चार (कुछ) दिन और रहना हो गया ॥ १ ॥
एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ ॥ करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी ॥
इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रातःकाल सब कोई स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान्की पूजा करते हैं ॥ २ ॥
रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ॥ राजा रामु जानकी रानी। आनंद अवधि अवध रजधानी ॥
फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके चरणोंकी वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्दकी सीमा होकर— ॥ ३ ॥
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुं जुबराजा ॥ एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू ॥
फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजीको युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सब किसीको जगत्में जीनेका लाभ दीजिये ॥ ४ ॥
दो०—गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ॥ २७३ ॥