भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 572

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  • रामचरितमानस *

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥ समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ॥

राजाने विद्वानों और मन्त्रियोंके समाजसे पूछा कि विचारकर कहिये, आज (इस समय) क्या करना उचित है? अयोध्याकी दशा समझकर और दोनों प्रकारसे असमंजस जानकर 'चलिये या रहिये?' किसीने कुछ नहीं कहा॥ ३ ॥

नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी॥ बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ॥

[जब किसीने कोई सम्मति नहीं दी] तब राजाने धीरज धर हृदयमें विचारकर चार चतुर गुप्तचर (जासूस) अयोध्याको भेजे [और उनसे कह दिया कि] तुमलोग [श्रीरामजीके प्रति] भरतजीके सद्भाव (अच्छे भाव, प्रेम) या दुर्भाव (बुरा भाव, विरोध) का [यथार्थ] पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसीको तुम्हारा पता न लगने पावे॥ ४ ॥

दो०—गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।

चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥ २७१॥

गुप्तचर अवधको गये और भरतजीका ढंग जानकर और उनकी करनी देखकर, जैसे ही भरतजी चित्रकूटको चले, वे तिरहुत (मिथिला) को चल दिये॥ २७१ ॥

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥ सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥

[गुप्त] दूतोंने आकर राजा जनकजीकी सभामें भरतजीकी करनीका अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुटुम्बी, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्नेहसे अत्यन्त व्याकुल हो गये॥ १ ॥

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥ घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥

फिर जनकजीने धीरज धरकर और भरतजीकी बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया। घर, नगर और देशमें रक्षकोंको रखकर छोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत-सी सवारियाँ सजवारीं॥ २ ॥

दुधरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥ भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥

वे दुधड़िया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजाने रास्तेमें कहीं विश्राम भी नहीं किया। आज ही सबेरे प्रयागराजमें स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे, ॥ ३ ॥

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