श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 575, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
५७३
भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियोंको साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे (जनकजीकी अगवानीमें) चले। जनकजीने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथको देखा, त्यों ही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया (पैदल चलना शुरू कर दिया) ॥ १ ॥
राम दरस लालसा उछाहूँ। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहूँ ॥ मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ॥
श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण किसीको रास्तेकी थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है। मन तो वहाँ है जहाँ श्रीराम और जानकीजी हैं। बिना मनके शरीरके सुख-दुःखकी सुध किसको हो ? ॥ २ ॥
आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती ॥ आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे ॥
जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं। समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है। निकट आये देखकर सब प्रेममें भर गये और आदरपूर्वक आपसमें मिलने लगे ॥ ३ ॥
लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ॥ भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि ॥
जनकजी [वसिष्ठ आदि अयोध्यावासी] मुनियोंके चरणोंकी वन्दना करने लगे और श्रीरामचन्द्रजीने [शतानन्द आदि जनकपुरवासी] ऋषियोंको प्रणाम किया। फिर भाइयोंसमेत श्रीरामजी राजा जनकजीसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रमको लिवा चले ॥ ४ ॥
दो०—आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥ २७५ ॥
श्रीरामजीका आश्रम शान्तरसरूपी पवित्र जलसे परिपूर्ण समुद्र है। जनकजीकी सेना (समाज) मानो करुणा (करुणरस) की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी शान्तरसके समुद्रमें मिलानेके लिये] लिये जा रहे हैं ॥ २७५ ॥
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे ॥ सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥
यह करुणाकी नदी [इतनी बड़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें (आहें) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गें हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं ॥ १ ॥
बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ॥ केवट बुध बिद्या बडि नावा। सकहिं न खेड़ ऐक नहिं आवा ॥