श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
भयानक विषाद (शोक) ही उस नदीकी तेज धारा है। भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं, (उस विद्याका उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसीको उसकी अटकल ही नहीं आती है ॥ २ ॥
बनचर कोल किरात बिचारे । थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ॥ आश्रम उदधि मिली जब जाई । मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई ॥
वनमें विचरनेवाले बेचारे कोल-किरात ही यात्री हैं, जो उस नदीको देखकर हृदयमें हारकर थक गये हैं। यह करुणा-नदी जब आश्रम-समुद्रमें जाकर मिली, तो मानो वह समुद्र अकुला उठा (खौल उठा) ॥ ३ ॥
सोक बिकल दोउ राज समाजा । रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा ॥ भूप रूप गुन सील सराही । रोवहिँ सोक सिंधु अवगाही ॥
दोनों राजसमाज शोकसे व्याकुल हो गये। किसीको न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही रही। राजा दशरथजीके रूप, गुण और शीलकी सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोकसमुद्रमें डुबकी लगा रहे हैं ॥ ४ ॥
छं०—अवगाहि सोक समुद्र सोचहिँ नारि नर व्याकुल महा । दै दोष सकल सरोष बोलहिँ बाम बिधि कीन्हो कहा ॥ सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की । तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की ॥
शोकसमुद्रमें डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच (चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाताको दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाताने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनिगणोंमें कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की दशा देखकर प्रेमकी नदीको पार कर सके (प्रेममें मग्न हुए बिना रह सके)।
सो०—किए अमित उपदेस जहाँ तहाँ लोगन्ह मुनिबरन्ह । धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन ॥ २७६ ॥
जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ मुनियोंने लोगोंको अपरिमित उपदेश दिये और बसिष्ठजीने विदेह (जनकजी) से कहा—हे राजन्! आप धैर्य धारण कीजिये ॥ २७६ ॥
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥ तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बड़ाई ॥