श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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जिन राजा जनकका ज्ञानरूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रिका नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं (आनन्दित करती हैं), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं? यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है! [अर्थात् राजा जनककी यह दशा श्रीसीतारामजीके अलौकिक प्रेमके कारण हुई, लौकिक मोह-ममताके कारण नहीं। जो लौकिक मोह-ममताको पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजीका प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता] ॥ १ ॥
बिषई साधक सिद्ध सयाने । त्रिबिध जीव जग वेद बखाने ॥ राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ॥
विषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष—जगत्में ये तीन प्रकारके जीव वेदोंने बताये हैं। इन तीनोंमें जिसका चित्त श्रीरामजीके स्नेहसे सरस (सराबोर) रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका बड़ा आदर होता है ॥ २ ॥
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥ मुनि बहुबिधि बिदेहे समुझाए । राम घाट सब लोग नहाए ॥
श्रीरामजीके प्रेमके बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधारके बिना जहाज। वसिष्ठजीने विदेहराज (जनकजी) को बहुत प्रकारसे समझाया। तदनन्तर सब लोगोंने श्रीरामजीके घाटपर स्नान किया ॥ ३ ॥
सकल सोक संकुल नर नारी । सो बासरु बीतेउ बिनु बारी ॥ पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारु । प्रिय परिजन कर कौन बिचारु ॥
स्त्री-पुरुष सब शोकसे पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जलके बीत गया (भोजनकी बात तो दूर रही, किसीने जलतक नहीं पिया)। पशु, पक्षी और हिरनोंतकने कुछ आहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियोंका तो विचार ही क्या किया जाय ? ॥ ४ ॥
दो०—दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात । बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कूस गात ॥ २७७ ॥
निमिराज जनकजी और रघुराज रामचन्द्रजी तथा दोनों ओरके समाजने दूसरे दिन सबेरे स्नान किया और सब बड़के वृक्षके नीचे जा बैठे। सबके मन उदास और शरीर दुबले हैं ॥ २७७ ॥
जे महिसुर दसरथ पुर बासी । जे मिथिलापति नगर निवासी ॥ हंस बंस गुर जनक पुरोधा । जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा ॥