श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ सुनकर सभासमेत मुनि और जनकजी सकुचा गये (स्तिम्भित रह गये)। किसीसे उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजीका मुँह ताक रहे हैं ॥ २९६ ॥
सभा सकुच बस भरत निहारी । रामबंधु धरि धीरजु भारी ॥ कुसमउ देखि सनेहु सँभारा । बद्धत बिंधि जिमि घटज निवारा ॥
भरतजीने सभाको संकोचके वश देखा। रामबन्धु (भरतजी) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने [उमड़ते हुए] प्रेमको सँभाला, जैसे बद्धते हुए विन्ध्याचलको अगस्त्यजीने रोका था ॥ १ ॥
सोक कनकल्लोचन मति छोनी । हरी बिमल गुन गन जगजोनी ॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला । अनायास उधरी तेहि काला ॥
शोकरूपी हिरण्याक्षने [सारी सभाकी] बुद्धिरूपी पृथ्वीको हर लिया जो विमल गुणसमूहरूपी जगत्की योनि (उत्पन्न करनेवाली) थी। भरतजीके विवेकरूपी विशाल वराह (वराहरूपधारी भगवान्) ने [शोकरूपी हिरण्याक्षको नष्ट कर] बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया! ॥ २ ॥
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे । रामु राउ गुर साधु निहोरे ॥ छमब आजु अति अनुचित मोरा । कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥
भरतजीने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वसिष्ठजी और साधु-संत सबसे विनती की और कहा—आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित बर्तावको क्षमा कीजियेगा। मैं कोमल (छोटे) मुखसे कठोर (धृष्टतापूर्ण) वचन कह रहा हूँ ॥ ३ ॥
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई । मानस तें मुख पंकज आई ॥ बिमल बिबेक धरम नय साली । भरत भारती मंजु मराली ॥
फिर उन्होंने हृदयमें सुहावनी सरस्वतीजीका स्मरण किया। वे मानससे (उनके मनरूपी मानसरोवरसे) उनके मुखारविन्दपर आ विराजें। निर्मल विवेक, धर्म और नीतिसे युक्त भरतजीकी वाणी सुन्दर हंसिनी [के समान गुण-दोषका विवेचन करनेवाली] है ॥ ४ ॥
दो०—निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु ।
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ॥ २९७ ॥
विवेकके नेत्रोंसे सारे समाजको प्रेमसे शिथिल देख, सबको प्रणामकर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके भरतजी बोले— ॥ २९७ ॥
प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अंतरजामी ॥ सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥