श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 595, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरलहृदय, श्रेष्ठ मालिक, शीलके भण्डार, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुज्ञान, ॥ १ ॥
समरथ सरनागत हितकारी । गुनगाहक अवगुन अघ हारी ॥ स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई । मोहि समान मैं साईं दोहाई ॥
समर्थ, शरणागतका हित करनेवाले, गुणोंका आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापोंको हरनेवाले हैं। हे गोसाई! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामीके साथ द्रोह करनेमें मेरे समान मैं ही हूँ ॥ २ ॥
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाजु सकेली ॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिअ अमरपद माहुरु मीचू ॥
मैं मोहवश प्रभु (आप) के और पिताजीके वचनोंका उल्लङ्घनकर और समाज बटोरकर यहाँ आया हूँ। जगत्में भले-बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और अमरपद (देवताओंका पद), विष और मृत्यु आदि— ॥ ३ ॥
राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥ सो मैं सब बिधि कीन्हि ठिठाई । प्रभु मानी सनेह सेवकाई ॥
किसीको भी कहीं ऐसा नहीं देखा-सुना जो मनमें भी श्रीरामचन्द्रजी (आप) की आज्ञाको मेट दे। मैंने सब प्रकारसे वही ठिठाई की, परन्तु प्रभुने उस ठिठाईको स्नेह और सेवा मान लिया ॥ ४ ॥
दो०—कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर । दूषण भे भूषण सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥ २९८ ॥
हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण (दोष) भी भूषण (गुण) के समान हो गये और चारों ओर मेरा सुन्दर यश छा गया ॥ २९८ ॥
राउरि रीति सुबानि बड़ाई । जगत बिदित निगमागम गाई ॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी । नीच निसील निरीस निसंकी ॥
हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभावकी बड़ाई जगत्में प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रोंने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक) और निःशंक (निडर) हैं ॥ १ ॥
तेउ सुनि सरन सामुहें आए । सकृत प्रनामु किहें अपनाए ॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने । सुनि गुन साधु समाज बखाने ॥