श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
५१५
कृपा अनुग्रह अंगु अघाई । कीन्हि कृपानिधि सब अधिकार्ई ॥ राखा मोर दुलार गोसाई । अपनैं सील सुभायँ भलाई ॥
कृपानिधानने मुझपर साझोपाङ्ग भरपेट कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं (अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सर्वाङ्गपूर्ण कृपा आपने मुझपर की है)। हे गोसाई! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाईसे मेरा दुलार रखा ॥ ३ ॥
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई । स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥ अबिनय बिनय जथारुचि बानी । छमिहि देउ अति आरति जानी ॥
हे नाथ! मैंने स्वामी और समाजके संकोचको छोड़कर अबिनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है। हे देव! मेरे आर्तभाव (आतुरता) को जानकर आप क्षमा करेंगे ॥ ४ ॥
दो०—सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि । आयसु देड़अ देव अब सबड़ सुधारी मोरि ॥ ३०० ॥
सुहृद (बिना ही हेतुके हित करनेवाले), बुद्धिमान् और श्रेष्ठ मालिकसे बहुत कहना बड़ा अपराध है। इसलिये हे देव! अब मुझे आज्ञा दीजिये, आपने मेरी सभी बात सुधार दी ॥ ३०० ॥
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ॥ सो करि कहउँ हिए अपने की । रुचि जागत सोवत सपने की ॥
प्रभु (आप) के चरणकमलोंकी रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुखकी सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदयकी जागते, सोते और स्वप्नमें भी बनी रहनेवाली रुचि (इच्छा) कहता हूँ ॥ १ ॥
सहज सनेहैं स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥ अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
वह रुचि है—कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना। और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय ॥ २ ॥
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी । पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई । समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥