श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
भरतजी ऐसा कहकर प्रेमके बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये। उस समयको और स्नेहको कहा नहीं जा सकता ॥ ३ ॥
कृपासिंधु सनमानि सुबानी । बैठिए समीप गहि पानी ॥ भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ । सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥
कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजीने सुन्दर वाणीसे भरतजीका सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजीकी विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेहसे शिथिल हो गये ॥ ४ ॥
छं०—रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी । मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ॥ भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से । तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥
श्रीरघुनाथजी, साधुओंका समाज, मुनि वसिष्ठजी और मिथिलापति जनकजी स्नेहसे शिथिल हो गये। सब मन-ही-मन भरतजीके भाईपन और उनकी भक्ति की अतिशय महिमाको सराहने लगे। देवता मलिन मनसे भरतजीकी प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं—सब लोग भरतजीका भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रिके आगमनसे कमल !
सो०—देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब । मधवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत ॥ ३०१ ॥
दोनों समाजोंके सभी नर-नारियोंको दीन और दुखी देखकर महामलिन-मन इन्द्र मेरे हुओंको मारकर अपना मङ्गल चाहता है ॥ ३०१ ॥
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू । पर अकाज प्रिय आपन काजू ॥ काक समान पाकरिपु रीती । छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥
देवराज इन्द्र कपट और कुचालकी सीमा है। उसे परायी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्रकी रीति कौएके समान है। वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसीपर विश्वास नहीं है ॥ १ ॥
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला । सो उचाटु सब कें सिर मेला ॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे । राम प्रेम अतिसय न बिछोहे ॥