श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन । खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ॥ प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी । आयसु होइ त आवौं देखी ॥
आज्ञा हो तो चित्रकूटके पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने और पर्वतोंके समूह तथा विशेषकर प्रभु (आप) के चरणचिह्नोंसे अंकित भूमिको देख आऊँ ॥ २ ॥
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू । तात बिगतभय कानन चरहू ॥ मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता । पावन परम सुहावन भ्राता ॥
[श्रीरघुनाथजी बोले—] अवश्य ही अत्रि ऋषिकी आज्ञाको सिरपर धारण करो (उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो) और निभंय होकर वनमें विचरो। हे भाई! अत्रि मुनिके प्रसादसे वन मङ्गलोंका देनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है— ॥ ३ ॥
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं । राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं ॥ मुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा । मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा ॥
और ऋषियोंके प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहाँ [लाया हुआ] तीर्थोंका जल स्थापित कर देना। प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया ॥ ४ ॥
दो०—भरत राम संबादु मुनि सकल सुमंगल मूल । सुर स्वार्थी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल ॥ ३०८ ॥
समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुलकी सराहना करके कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे ॥ ३०८ ॥
धन्य भरत जय राम गोसाई । कहत देव हरषत बरिआई ॥ मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू । भरत बचन मुनि भयउ उछाहू ॥
‘भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजीकी जय हो!’ ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक (अत्यधिक) हर्षित होने लगे। भरतजीके वचन सुनकर मुनि वसिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभामें सब किसीको बड़ा उत्साह (आनन्द) हुआ ॥ १ ॥
भरत राम गुन ग्राम सनेहू । पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥ सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन । नेमु पेमु अति पावन पावन ॥
भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहकी तथा प्रेमकी विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनोंका सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्रको भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं ॥ २ ॥