श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 605, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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मति अनुसार सराहन लागे । सचिव सभासद सब अनुरागे ॥ सुनि सुनि राम भरत संबादू । दुहु समाज हिर्ष हरषु बिषादू ॥
मन्त्री और सभासद सभी प्रेममृगध होकर अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार सराहना करने लगे । श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीका संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके हृदयोंमें हर्ष और विषाद (भरतजीके सेवाधर्मको देखकर हर्ष और रामवियोगकी सम्भावनासे विषाद) दोनों हुए ॥ ३ ॥
राम मातु दुखु सुखु सम जानी । कहि गुन राम प्रबोध्नी रानी ॥ एक कहहिं रघुबीर बड़ाई । एक सराहत भरत भलाई ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने दुःख और सुखको समान जानकर श्रीरामजीके गुण कहकर दूसरी रानियोंको धैर्य बँधाय। कोई श्रीरामजीकी बड़ाई (बड़प्पन) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजीके अच्छेपनकी सराहना करते हैं ॥ ४ ॥
दो०—अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप ।
राखिअ तीरथ तोय तहाँ पावन अमिअ अनूप ॥ ३०९ ॥
तब अत्रिजीने भरतजीसे कहा—इस पर्वतके समीप ही एक सुन्दर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत-जैसे तीर्थजलको उसीमें स्थापित कर दीजिये ॥ ३०९ ॥
भरत अत्रि अनुसासन पाई । जल भाजन सब दिए चलाई ॥ सानुज आपु अत्रि मुनि साधू । सहित गए जहाँ कूप अगाधू ॥
भरतजीने अत्रिमुनिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रि मुनि तथा अन्य साधु-सन्तोंसहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था ॥ १ ॥
पावन पाथ पुन्यथल राखा । प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा ॥ तात अनादि सिद्ध थल एहू । लोपेउ काल बिदित नहिं केहू ॥
और उस पवित्र जलको उस पुण्यस्थलमें रख दिया। तब अत्रि ऋषिने प्रेमसे आनन्दित होकर ऐसा कहा—हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रमसे यह लोप हो गया था इसलिये किसीको इसका पता नहीं था ॥ २ ॥
तब सेवकन्ह सरस थलु देखा । कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा ॥ बिधिबस भयउ बिस्व उपकारू । सुगम अगम अति धरम बिचारू ॥
तब [भरतजीके] सेवकोंने उस जलयुक्त स्थानको देखा और उस सुन्दर [तीर्थोंके] जलके लिये एक खास कुआँ बना लिया। दैवयोगसे विश्वभरका उपकार हो गया। धर्मका विचार जो अत्यन्त अगम था, वह [इस कूपके प्रभावसे] सुगम हो गया ॥ ३ ॥