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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 606

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  • रामचरितमानस *

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा । अति पावन तीरथ जल जोगा ॥ प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी । होइहहिं बिमल करम मन बानी ॥

अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे । तीर्थोंके जलके संयोगसे तो यह अत्यन्त ही पवित्र हो गया । इसमें प्रेमपूर्वक नियमसे स्नान करनेपर प्राणी मन, वचन और कर्मसे निर्मल हो जायेंगे ॥ ४ ॥

दो०—कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ ।

अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ ॥ ३१० ॥

कूपकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे । श्रीरघुनाथजीको अत्रिजीने उस तीर्थका पुण्य प्रभाव सुनाया ॥ ३१० ॥

कहत धरम इतिहास सप्रिती । भयउ भोरु निसि सो सुख बीती ॥

नित्य निबाहि भरत दोउ भाई । राम अत्रि गुर आयसु पाई ॥

प्रेमपूर्वक धर्मके इतिहास कहते वह रात सुखसे बीत गयी और सबेरा हो गया । भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर, ॥ १ ॥

सहित समाज साज सब सादें । चले राम बन अटन पयादें ॥

कोमल चरन चलत बिनु पनहीं । भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं ॥

समाजसहित सब सादे साजसे श्रीरामजीके वनमें भ्रमण (प्रदक्षिणा) करनेके लिये पैदल ही चले । कोमल चरण हैं और बिना जूतेके चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन-ही-मन सकुचाकर कोमल हो गयी ॥ २ ॥

कुस कंटक काँकरीं कुराई । कटुक कठोर कुबस्तु दुराई ॥

महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे । बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे ॥

कुश, काँटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओंको छिपाकर पृथ्वीने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये । सुखोंको साथ लिये (सुखदायक) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी ॥ ३ ॥

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं । बिटप फूलि फलि तून मृदुताहीं ॥

मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी । सेवहिं सकल राम प्रिय जानी ॥

रास्तेमें देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलतासे, मृग (पशु) देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर—सभी भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे ॥ ४ ॥

दो०—सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात ।

राम प्रानप्रिय भरत कहूं यह न होइ बड़ि बात ॥ ३११ ॥