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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 616, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 616

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  • रामचरितमानस *

भरतजीने मन्त्रियों और विश्वासी सेवकोंको समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने-अपने काममें लग गये। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नीको बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओंकी सेवा उनको सौंपी ॥ १ ॥

भूसुर बोलि भरत कर जोरे । करि प्रनाम बय बिनय निहोरे ॥ ऊँच नीच कारजु भल पोचू । आयसु देब न करब सँकोचू ॥

ब्राह्मणोंको बुलाकर भरतजीने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्थाके अनुसार विनय और निहोरा किया कि आपलोग ऊँचा-नीचा (छोटा-बड़ा), अच्छा-मन्दा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा ॥ २ ॥

परिजन पुरजन प्रजा बोलाए । समाधानु करि सुबस बसाए ॥ सानुज गे गुर गेहँ बहोरी । करि दंडवत कहत कर जोरी ॥

भरतजीने फिर परिवारके लोगोंको, नागरिकोंको तथा अन्य प्रजाको बुलाकर, उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नीसहित वे गुरुजीके घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ ३ ॥

आयसु होइ त रहँ सनेमा । बोले मुनि तन पुलकि सपेमा ॥ समुद्गब कहब करब तुम्ह जोई । धरम सारु जग होइहि सोई ॥

आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ! मुनि वसिष्ठजी पुलकितशरीर हो प्रेमके साथ बोले—हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत्में धर्मका सार होगा ॥ ४ ॥

दो०— सुनि सिख पाड़ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि ।

सिंधासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि ॥ ३२३ ॥

भरतजीने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियोंको बुलाया और दिन (अच्छा मुहूर्त) साधकर प्रभुकी चरणपादुकाओंको निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासनपर विराजित कराया ॥ ३२३ ॥

राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ॥ नंदिगावँ करि परन कुटीरा । कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा ॥

फिर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी और गुरुजीके चरणोंमें सिर नवाकर और प्रभुकी चरणपादुकाओंकी आज्ञा पाकर धर्मकी धुरी धारण करनेमें धीर भरतजीने नन्दिग्राममें पर्णकुटी बनाकर उसीमें निवास किया ॥ १ ॥

जटाजूट सिर मुनिपट धारी । महि खनि कुस साँथरी सँवारी ॥ असन बसन बासन ब्रत नेमा । करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा ॥