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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 617
  • अयोध्याकाण्ड *

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सिरपर जटाजूट और शरीरमें मुनियोंके [वलकल] वस्त्र धारण कर, पृथ्वीको खोदकर उसके अंदर कुशकी आसनी बिछायी। भोजन, वस्त्र, बरतन, व्रत, नियम—सभी बातोंमें वे ऋषियोंके कठिन धर्मका प्रेमसहित आचरण करने लगे ॥ २ ॥

भूषन बसन भोग सुख भूरी । मन तन बचन तजे तिन तूरी ॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई । दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ॥

गहने-कपड़े और अनेकों प्रकारके भोग-सुखोंको मन, तन और वचनसे तृण तोड़कर (प्रतिज्ञा करके) त्याग दिया। जिस अयोध्याके राज्यको देवराज इन्द्र सिहाते थे और [जहाँके राजा] दशरथजीकी सम्पत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे, ॥ ३ ॥

तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ॥ रमा बिलासु राम अनुरागी । तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥

उसी अयोध्यापुरीमें भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पाके बागमें भौरा। श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मीके विलास [भोगैश्वर्य] को वमनकी भाँति त्याग देते हैं (फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं) ॥ ४ ॥

दो०—राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति । चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ॥ ३२४ ॥

फिर भरतजी तो [स्वयं] श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके पात्र हैं। वे इस (भोगैश्वर्यत्यागरूप) करनीसे बड़े नहीं हुए (अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है)। [पृथ्वीपरका जल न पीनेकी] टेकसे चातककी और नीर-क्षीर-विवेककी विभूति (शक्ति) से हंसकी भी सराहना होती है ॥ ३२४ ॥

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई । घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ॥ नित नव राम प्रेम पनु पीना । बद्धत धरम दलु मनु न मलीना ॥

भरतजीका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है। तेज (अन्न, घृत आदिसे उत्पन्न होनेवाला मेद*) घट रहा है। बल और मुखछबि (मुखकी कान्ति अथवा शोभा) वैसी ही बनी हुई है। रामप्रेमका प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्मका दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है (अर्थात् प्रसन्न है) ॥ १ ॥

  • संस्कृत-कोषमें 'तेज' का अर्थ मेद मिलता है और यह अर्थ लेनेसे 'घटइ' के अर्थमें भी किसी प्रकारकी खींच-तान नहीं करनी पड़ती।

जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे । बिलसत बेतस बनज बिकासे ॥ सम दम संजम नियम उपासा । नखत भरत हिय बिमल अकासा ॥

जैसे शरद-ऋतुके प्रकाश [विकास] से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। शम, दम, संजम, नियम और उपवास आदि भरतजीके हृदयरूपी निर्मल आकाशके नक्षत्र (तारागण) हैं ॥ २ ॥