श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 618, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी । स्वामि सुरति सुरबीधि बिकासी ॥ राम पेम बिधु अचल अदोषा । सहित समाज सोह नित चोखा ॥
विश्वास ही [उस आकाशमें] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि [का ध्यान] पूर्णमाके समान है और स्वामी श्रीरामजीकी सुरति (स्मृति) आकाशगङ्गा-सरीखी प्रकाशित है। रामप्रेम ही अचल (सदा रहनेवाला) और कलङ्करहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज (नक्षत्रों) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है ॥ ३ ॥
भरत रहनि समुद्भनि करतूती । भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ॥ बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं । सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ॥
भरतजीकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्यका वर्णन करनेमें सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [औरोंकी तो बात ही क्या] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है ॥ ४ ॥
दो०—नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति । मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति ॥ ३२५ ॥
वे नित्यप्रति प्रभुकी पादुकाओंका पूजन करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं है। पादुकाओंसे आज्ञा माँग-माँगकर वे बहुत प्रकार (सब प्रकारके) राज-काज करते हैं ॥ ३२५ ॥
पुलक गात हिउँ सिय रघुबीरू । जीह नामु जप लोचन नीरू ॥ लखन राम सिय कानन बसहीं । भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं ॥
शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रोंमें प्रेमका जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वनमें बसते हैं, परन्तु भरतजी घरहीमें रहकर तपके द्वारा शरीरको कस रहे हैं ॥ १ ॥
दोउ दिसि समुद्भि कहत सबु लोगू । सब बिधि भरत सराहन जोगू ॥ सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं । देखि दसा मुनिराज लजाहीं ॥
दोनों ओरकी स्थिति समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकारसे सराहने योग्य हैं। उनके ब्रत और नियमोंको सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं ॥ २ ॥
परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू ॥ हरन कठिन कलि कलुष कलेसू । महामोह निसि दलन दिनेसू ॥
भरतजीका परम पवित्र आचरण (चरित्र) मधुर, सुन्दर और आनन्द-मङ्गलोंका करनेवाला है। कलियुगके कठिन पापों और क्लेशोंको हरनेवाला है। महामोहरूपी रात्रिको नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है ॥ ३ ॥