श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 626, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
हे लक्ष्मीपते! हे सुर्योंकी खान और सत्यरुषोंकी एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे शचीपति (इन्द्र) के प्रिय छोटे भाई (वामनजी)! स्वरूपा-शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित आपको मैं भजता हूँ॥ ६ ॥
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥ ७ ॥
जो मनुष्य मत्सर (डाह) रहित होकर आपके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क (अनेक प्रकारके सन्देह) रूपी तरङ्गोंसे पूर्ण संसाररूपी समुद्रमें नहीं गिरते (आवागमनके चक्करमें नहीं पड़ते)॥ ७ ॥
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा। निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥ ८ ॥
जो एकान्तवासी पुरुष मुक्तिके लिये, इंद्रियादिका निग्रह करके (उन्हें विषयोंसे हटाकर) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गतिको (अपने स्वरूपको) प्राप्त होते हैं॥ ८ ॥
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं। जगदुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥ ९ ॥
उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत्से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगदगुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणोंसे सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूपमें स्थित) हैं॥ ९ ॥
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥ १० ॥
[तथा] जो भावप्रिय, कुयोगियों (विषयी पुरुषों)के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष (अर्थात् उनकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले), सम (पक्षपातरहित) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं; मैं निरन्तर भजता हूँ॥ १० ॥
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमूर्विजा पतिं। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ ११ ॥
हे अनुपम सुन्दर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे अपने चरणकमलोंकी भक्ति दीजिये॥ ११ ॥
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं। व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥ १२ ॥
जो मनुष्य इस स्तुतिको आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्तिसे युक्त होकर आपके परमपदको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं॥ १२ ॥