श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 627, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अरण्यकाण्ड *
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दो०—बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि ॥ ४ ॥
मुनिने [इस प्रकार] विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा—हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलोंको कभी न छोड़े ॥ ४ ॥
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता ॥ रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई ॥
फिर परम शीलवती और विनम्र श्रीसीताजी [अत्रिजीकी पत्नी] अनसूयाजीके चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषिपत्नीके मनमें बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशिष देकर सीताजीको पास बैठा लिया ॥ १ ॥
दिव्य बसन भूषण पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए ॥ कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी ॥
और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य-नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर ऋषिपत्नी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणीसे स्त्रियोंके कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं ॥ २ ॥
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी ॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥
हे राजकुमारी! सुनिये, माता, पिता, भाई सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमातक ही [सुख] देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी! पति तो [मोक्षरूप] असीम [सुख] देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पतिकी सेवा नहीं करती ॥ ३ ॥
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी ॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना ॥
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री—इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन— ॥ ४ ॥
ऐसेहु पति कर किऐँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥ एकड़ धर्म एक व्रत नेमा। कार्यँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥
ऐसे भी पतिका अपमान करनेसे स्त्री यमपुरमें भाँति-भाँतिके दुःख पाती है। शरीर, बचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना स्त्रीके लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है ॥ ५ ॥